सी .पी .सिंह, सीनियर एसोसिएट एडीटर-ICN “ लघु – कथा “ हर घर की अपनी मर्यादाये होती है , संस्कार होते हैं , मान्यताएं होती है | हर घर किसी समाज का हिस्सा होता है | हर समाज सभी घरों का सम्मिलित रूप होता है | समाज के अपने संस्कार होए हैं , मान्यताएं होती हैं , मर्यादाएं होती हैं | प्रायः यह उन सभी घरों की परम्पराओं का एकीकृत रूप होता है | हर घर अपने समाज के प्रति उत्तरदाई होता है | ऐसे ही सम्बंधित समाज की बड़ी…
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“तुम बस साथ रहना”
आलोक सिंह, न्यूज़ एडिटर, आई.सी.एन. ग्रुप वक़्त यूँ मुश्किल है पर गुज़र जायेगा तुम बस साथ रहना साथ ये अब सात जन्मों तक जायेगा तुम बस साथ रहना मुश्किल सफर भी आसान हो जाएगा तुम बस साथ रहना साथ साथ देखा, सच हर ख्वाब हो जायेगा तुम बस साथ रहना तेज़ धूप में झींना साया भी सुकून दे जायेगा तुम बस साथ रहना तिनका, तिनका जोड़कर आशियाँ बन जायेगा तुम बस साथ रहना तेरी आँखों की चमक से घर रौशन हो जाएगा तुम बस साथ रहना अपनी मोहब्बत से कोना…
Read Moreमेरा भारत महान है
सत्येन्द्र कुमार सिंह, संपादक-ICN कृतिदेव यहां मैं एक इन्सान हूँ एक बाशिन्दा हूँ, धरती के शान का अपने भारत महान का। कभी-कभी मेरे मन में एक भूचाल आता है, एक प्रश्न कौन्धता है, एक सवाल आता है कि क्या मैं इसे महान बनाने के लिए कुछ कर सकता हूँ? या सच पूछिए तो कदम भी बढ़ जाते हैं खुद-ब-खुद, किन्तु यह खेल तो है चन्द पलों का, और ये बढ़े कदम लौट आते हैं। सड़क किनारे, भूखे-प्यासे बिलखते शिशु को देखता हूँ तो हृदय मेरा भी रोता है, सहायतार्थ जेब…
Read Moreभगवान की ब्रांडिंग
अमरेश कुमार सिंह, असिस्टेंट एडिटर ICN ग्रुप देखिए वैसे हिंदू, मुस्लिम, सिख इसाई, आदि- इत्यादि के नाम पर हमने अपने तरीके से नीले आसमान के ऊपर बैठे अदृश्य ताकत को राम रहीम ईशा नानक जिसे विभिन्न तरह के नाम दे दिए हैं। लेकिन शायद यह जानकर आपको काफी आश्चर्य होगा कि तमाम देवी-देवता धरती पर अपनी एक ही रूप के कई ब्रांडिंग बन चुके हैं। चलिए हम देवों के देव महादेव का ही उदाहरण ले लेते हैं। महादेव का भी दायरा बंधा हुआ है। अगर हम महा ज्ञानियों के महाज्ञान के…
Read Moreसमाचारपत्र से प्रेमपत्र तक
तरुण प्रकाश, सीनियर एग्जीक्यूटिव एडीटर-ICN ग्रुप हर सवेरे आ जाते हैं समाचारपत्र , खिड़की के रास्ते उछल कर प्रवेश करते हैं ड्राइंगरूम में हत्या , लूट, आगजनी और बलात्कार । कवि कविता रच रहा है लेखक लिख रहा है सत्य और विश्वास की कहानी संगीतकार बरसाता है अक्षत निर्झर और चित्रकार रचता है, इस लिज़लिज़ी ज़मीन पर दमदमाता अंबर लेकिन – यह सब समय के साँचे पर कस नहीं पाता पता नहीं – यह समय गलत है या ये लोग। सोचता हूँ , अभी नहीं आया था मेरे जन्म लेने का…
Read Moreस्वर्ग में बीवी
अखिल आनंद, एसोसिएट एडीटर-ICN ग्रुप बचपन से त्याग तपस्या और सादगी वाला जीवन व्यतीत करता रहा हूँ, जीवन में सदा अच्छे काम करना तथा लोगों में भलाई करना यही कर्म रहा हैं, उद्देश्य यही है कि स्वर्ग की प्राप्ति हो। स्वर्ग के प्रति एक उत्सुक्ता हमेशा से ही रही है। हो भी फिर क्यों न स्वर्ग तो स्वर्ग ही है। कड़ी मेहनत के बाद आखिरकार स्वर्ग की प्राप्ति हो ही गई। बड़ी खुशी हुई कि हमारा उद्देश्य सफल रहा। प्रभु ने हमारी सुन ही ली, और मृत्यु उपरान्त सीधे स्वर्ग का दरवाजा…
Read More“फिर वही हरियाली छाँव दे दो”
आलोक सिंह, न्यूज़ एडिटर, आई.सी.एन. ग्रुप मेरे मोहल्ले का अजीब सा हाल हुआ जब दरवाज़े पर खड़े नीम का क़त्ल हुआ मायूस बैठा है तबसे नीम का तोता देखो तो उसे फिर वही हरियाली छाँव दे दो… सूखी सड़के, बन्द दरवाज़े और ग़ुम उल्लास और न तपती धूप में ठंडक का अहसास जलते हैं ये पाँव मेरे बाहर उनसे ज़रा कह दो उसे फिर वही हरियाली छाँव दे दो… अब न दादी के किस्से हैं और न कहानियां पसरा सन्नाटा है और खामोश किलकारियां बड़ी मनहूसियत है गली में उनके…
Read Moreक़ासिद
आलोक सिंह ( न्यूज़ एडिटर-आई.सी.एन. ग्रुप ) “आजकल मोहल्ले में क़ासिद नही दिखते लगता है ख़तों का सिलसिला थम गया है बेतार संदेसे अब रिश्तों के तार बांधते हैं और उंगलियों से दिलों को टटोलते हैं साफगोई जो उस वक़्त ख़तों में दिखती थी वो अब अहसास ऊपर आते अल्फ़ाज़ों में तलाशते हैं कितने ही किस्से घर आते क़ासिद से जुड़े थे उसके न आने से वो किस्से भी अब रूठे से हैं कितनी दफ़ा ग़म को उस क़ासिद ने भी बांटा था अब तो ग़म को भी ग़म का…
Read Moreपानी
आलोक सिंह ( न्यूज़ एडिटर-आई.सी.एन. ग्रुप ) आज के समाज की दुखद है कहानी न बाहर और न आँख में बचा है पानी चाँद पर पानी का पता लगा इतराते हैं और घर के खोते पानी का होश नही न मालूम कौन सा शैतान सवार है हम पर कालीदास सा कुल्हाडी लिए काट रहे हैं निसहाय पड़े हैं दरख्त बुझाते लालच की प्यास और नदियाँ ताकती हैं आसमाँ लिए प्यासी आँख सूखे कुँए और तरसते पोखर मायूस हैं अब तो सबके हक़ के पानी पर रूपयों की जिल्द देख आज…
Read Moreयूँ बेवजह मुस्कुराने का भी अपना मज़ा है
आलोक सिंह ( एसोसिएट एडीटर-ICN ग्रुप ) क्यों तलाशते हो तुम वजह मुस्कुराने की यूँ बेवजह मुस्कुराने का भी अपना मज़ा है क्यों सोचते हो साहिल पर ठहर जाने की यूँ मौजों से टकराने का भी अपना मज़ा है क्यों ढूंढते हो रास्ते मंजिलों को पा जाने की यूँ बेसबब आवारगी का भी अपना मज़ा है क्यों चाहत है दरख्तों की छांव में बैठ जाने की यूँ खिलती धूप में पिघलने का भी अपना मज़ा है क्यों देखूं खुदा की तरफ उसकी नेमत आने की यूँ उठकर खुद कर दिखाने का भी…
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