झाकड़ी: एसजेवीएन लि0 के नाथपा झाकड़ी हाइड्रो पावर स्टेशन द्वारा परियोजना क्षेत्र में स्थित विद्यालयों के विद्यार्थियों में निगम की छवि को बनाए रखने एवं राजभाषा हिन्दी के प्रचार–प्रसार की दृष्टि से राजभाषा अनुभाग द्वारा दिनांक 04-09-2018 को राजकीय उच्च विद्यालय सनारसा जिला शिमला में जीवन मूल्य और हम विषय पर भाषण प्रतियोगिता का आयोजन किया गया । “नहीं है बेहतर इंसान जो जीवन-मूल्य का न करे सम्मान—–” उक्त पंक्तियों से युक्त इस भाषण प्रतियोगिता में प्रतिभागियों द्वारा जीवन मूल्यों में नैतिकता का समावेश कर जीवन में साम्प्रदायिकता] भ्रष्टाचार रहित एवं सच्चाई…
Read MoreCategory: साहित्य
मैं मंज़िलों का मुसाफ़िर हूँ
आलोक सिंह, एडिटर-ICN मैं मंज़िलों का मुसाफ़िर हूँ मुझे रास्तों से प्यार है मैं नतीजों से मुखातिब हूँ मुझे मुश्किलों से प्यार है मंज़िलों की चाहत में रास्तों को न भूल जाना उनका क्या है मानिंद वक़्त के उनको भी बदल जाना मैं मंज़िलों का मुसाफ़िर हूँ मुझे रास्तों से प्यार है मंज़िलों के सफर में हमसफ़र का ही मज़ा है न हों ग़र ये साथ तो हर पल एक सज़ा है मैं मंज़िलों का मुसाफ़िर हूँ मुझे रास्तों से प्यार है कितने तजुर्बे कितने किस्से रह जाते हैं सफ़र…
Read Moreकोई इतवार नहीं
सत्येन्द्र कुमार सिंह, लिटरेरी एडिटर-ICN बचपन में इठलाते-बलखाते, कदमो से करते चहलकदमी हम । तुतलाती किलकारियों की गवाह यह चारदीवारी, आज विभाजित होती ममता दीवारों के बीच। संशय भरी आँखों से ताकती माँ, अपने हिस्से का बँटवारा । चलो, एक बात तो पुख्ता हो गई कि ममता की तकलीफ का कोई इतवार नहीं|
Read More“एक ख़्वाब और तुम”
आलोक सिंह, एडिटर-आई.सी.एन. “मेरी ज़िंदगी एक ख़्वाब से जुड़ी है और वो ख़्वाब जो तुमसे जुड़ा है उस ख़्वाब में पहाड़ है और पहाड़ से निकलती एक नदी नदी में अपनी मौज में बहता पानी उस पानी से होकर आती ठंडी हवा और कल कल बहते पानी की आवाज़ उसी नदी के किनारे एक छोटा सा काठ का घर जहाँ तुम जब चाहो और जब तक चाहो बैठ सको पैर डालकर उस नदी के ठंडे पानी मे और हाँ खिलती रोज़ सुबह की धूप में अपने हरे भरे गार्डन में…
Read Moreमरे भी तो उम्र भर के लिए
सत्येन्द्र कुमार सिंह, लिटरेरी एडिटर-ICN प्रेम की डोर से बंधे हम-तुम, बढ़ चले कदम जीवन के क्षितिज की ओर, जो शीतल हवा के मध्य बैठे स्याह रात में, भोर की प्रथम प्रहर तक कर-बद्ध तो अमर प्रेम का भाव बरबस ही बोल उठा “जीवन के परे संग रहे परस्पर कि मरे भी तो उम्र भर के लिए।”
Read Moreयुग पुरुष अटल के प्रति शब्दांजलि
तरुण प्रकाश, सीनियर एग्जीक्यूटिव एडीटर-ICN ग्रुप हे राष्ट्रपुरुष, हे दिव्य पुरुष, युग-पुरुष तुम्हारी जय जय जय । हे धरापुत्र, हे कालपुत्र, हे प्रेमपुजारी जय जय जय ॥१॥ ये वर्तमान, वे भावीक्षण, इतिहास तुम्हारी जय बोले। जन जन के मन में बसा हुआ, विश्वास तुम्हारी जय बोले॥२॥ तुम अटल नीति के थे वाहक, हर पीर तुम्हारी अपनी थी । हर चेहरे पर मुस्कान लिये, तस्वीर तुम्हारी अपनी थी॥३॥ तुम हँसते थे, जग हँसता था, अधरों पर जग मुस्काता था। हर बार तुम्हारी आँखों से, जग का दुख अश्रु बहाता था॥૪॥ सौ धर्म,…
Read Moreवो मेरा हिन्दुस्तान है…
आलोक सिंह, एडिटर-आई.सी.एन. जहाँ मेरे सपने जवान हैं और ख्वाहिशें परवान हैं वो मेरा हिन्दुस्तान है जहाँ उम्मीदों का खुला आसमान है और आसमान में दौड़ते अरमान है वो मेरा हिन्दुस्तान है… जहाँ सीमा पर निडर खड़ा जवान है और खुशहाली के बीज बोता किसान है वो मेरा हिन्दुस्तान है… जहाँ सभ्यता, संस्कृति विश्व पहचान है और भविष्य का चराग़ हर नौजवान है वो मेरा हिन्दुस्तान है… जहाँ सरपरस्ती देता अटल हिमालय है और माँ भारती को तरता गंगा जल है वो मेरा हिंदुस्तान है… जहाँ केसरिया संग हरा सफेद…
Read More“अपना ही भाई है “
आलोक सिंह, एडिटर-आई.सी.एन. आज वक़्त की सरहदों से फिर आवाज़ आयी है दूर खड़ा सरहदों पे ताने सीना अपना ही भाई है छोड़ कर घर गली नुक्कड़ वो सीमा पे जा बैठा है इस देश की सिपहसलारी करता अपना ही भाई है आज वक़्त… राखी दूज और त्योहार छोड़े वो बेखौफ खड़ा है शान पे माँ भारती की मर-मिटता अपना ही भाई है आज वक़्त… बिन देखे मासूम को अपने वो आगे ही बढ़ा है तुम्हारे सायों के लिये लड़ता अपना ही भाई है आज वक़्त… आसानी से क्यों भूल…
Read More“ महान–गीतकार, नीरज जी के–प्रति “
सी पी सिंह, एसोसिएट एडिटर-ICN इस , जग – आँगन – का – कल, भावुक – हो – ढूँढेगा , उस – वृक्ष को , जिसमें , शब्द , फूल – बन – खिलते – थे | जिसकी कलियाँ , खुद – चिर – युग – का कारवां – बनीं, निज – केशर को , जो – खुद , गुबार – कह – हिलते – थे || जिसके पत्ते , हँसि, प्रकृति के बन्दनवार – बने | हरी – कोपलें भी , जग – हित , फूलों सा प्यार –…
Read Moreगीत पुरुष नीरज के प्रति श्रद्धा सुमन
तरुण प्रकाश, सीनियर एग्जीक्यूटिव एडीटर-ICN ग्रुप कल आने वाली नस्लें मुझसे पूछेंगी, युग पुरुष कभी क्या तुमने कोई देखा था। जी रहा हमेशा था निज साँसों से जग को, जिसके अंदर सम्पूर्ण भुवन का लेखा था॥ जो था खुद कोमल फूल सरीखा अपने में, कैसे शब्दों को धार दिया वो करता था। जो कृष्ण सरीखा वंशी कभी बजाता था, कैसे शिव सा विषपान किया वो करता था ॥ जिसके शब्दों से फूल बरसते रहते थे, जिसके शब्दों से पर्वत तक हट जाते थे। जिसके शब्दों से अमृत राग छलकता था, जिसके…
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