शिक्षा के व्यापारीकरण के नीतिगत फैसलों से शिक्षा महंगी होने के फलस्वरूप आमजन की पहुंच से दूर हो रही है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने भारतीय मेडिकल कौंसिल बोर्ड को मेडिकल शिक्षा की फीसें घटाने के निर्देश दिए हैं।
सरकार का कहना है कि प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों खासकर मानद विश्वविद्यालयों द्वारा वसूले जा रहे मनमाने दामों को शीघ्र कम किया जाये। सरकार द्वारा सितंबर, 2018 में भंग की गयी मेडिकल कौंसिल के सम्मुख भी महंगी फीस का ही मुद्दा उलझा रहा। कौंसिल का कहना था कि फीस वृद्धि के मामले में हस्तक्षेप करना उसके अधिकार में नहीं है। शिक्षा के व्यापारीकरण के कारण समाज का एक बड़ा वर्ग बुनियादी शिक्षा से भी वंचित होता जा रहा है। बहुत से होनहार बच्चे पैसे की दिक्कत के चलते दाखिला नहीं ले पाते। सच्चाई यह भी है कि एमबीबीएस की दाखिला परीक्षा में मेरिट दर्जा हासिल करने के बावजूद कई बच्चों को महज इसलिए प्रवेश नहीं मिलता क्योंकि वे भारी-भरकम फीस अदा नहीं कर सकते। एनआरआई कोटे में तो मेरिट भी नहीं देखी जाती। वहां तो पैसे की माया का ही खेल चलता है।दरअसल इससे मेडिकल शिक्षा के स्तर में गिरावट आनी स्वाभाविक है। फिर महंगी पढ़ाई पढ़कर डाक्टर बनने वाले विद्यार्थी मेडिकल को कायम रख पाएंगे, यह टेढ़ा सवाल है। इसी कारण चिकित्सा सरीखे पवित्र व्यवसाय के ऊपर व्यापारीकरण भारी पड़ रहा है। शिक्षा व स्वास्थ्य संबंधी सहूलियतें मुहैया कराना सरकार की जिम्मेवारी है। सरकार द्वारा स्वास्थ्य तथा शिक्षा जैसी मूलभूत जरूरतों की ओर से हाथ खींचे जाने के फलस्वरूप उसकी प्राइवेट संस्थाओं पर निर्भरता बढ़ रही है। शिक्षा व चिकित्सा क्षेत्र में कार्पोरेट कॉलेजों और अस्पतालों की आमद के कारण मनमाना पैसा वसूला जा रहा है। लिहाजा कई कमेटियों और आयोगों का मानना है कि सभी को बराबर सहूलियतें मुहैया कराने के लिए स्वास्थ्य व शिक्षा विभाग केवल सरकारी क्षेत्र के ही अधीन होने चाहिए।

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