गीत-गीता : 7

तरुण प्रकाश श्रीवास्तव , सीनियर एग्जीक्यूटिव एडीटर-ICN ग्रुप  (श्रीमद्भागवत गीता का काव्यमय भावानुवाद) द्वितीय अध्याय (सांख्य योग) (छंद 8-14)   अर्जुन : (श्लोक 4-8)   है किसे पता क्या होगा, परिणाम युद्ध का माधव। कौरव को विजय मिलेगी, या रण जीतेंगे पांडव।।(8)   जो खड़ा सामने कुरु दल, वे भी हैं अपने भ्राता । उनके ही वध करके, क्या सुख से जुड़ पाये नाता?(9)   हे नाथ, भ्रमित मति मेरी, कायरता, भय जगते हैं। आयुध हितकर कब मुझको अब किंचित भी लगते हैं।। (10)   क्या धर्म भला इस पल है, …

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उर्दू शायरी में ‘बारिश’ : 3

  तरुण प्रकाश श्रीवास्तव, सीनियर एग्जीक्यूटिव एडीटर-ICN ग्रुप बारिश, बरसात या सावन – ये केवल झर झर झरते पानी का ही मौसम नहीं है बल्कि ये मदमस्त कर देने वाली सोंधी सोंधी कच्ची खुश्बू का भी मौसम है। यह दुनिया के सभी साहित्यों के सबसे पसंदीदा विषय है।उर्दू शायरी में बरसात के हज़ारों रंग दिखाई पड़ते हैं और कुछ रंग तो इतने पक्के हैं जो सीधे दिल पे अल्पनायें सजा जाते हैं।    संजय मिश्र ‘शौक’ उर्दू शायरी में फ़िराक़ गोरखपुरी, चक़बस्त व कृष्ण बिहारी ‘नूर’ की तरह गैर मुस्लिम…

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पेड-मीडिया केे निशाने पर हिंदुस्तान की गंगा-जमुना तहज़ीब

एज़ाज़ क़मर, एसोसिएट एडिटर-ICN नई दिल्ली। पत्रकारिता मुझे विरासत मे मिली, मेरे छोटे नाना का छोटे से शहर मे छोटा सा एक अखबार था,उनके मंझले बेटे अखबार तैयार (मूल-प्रतिलिपी) किया करते थे,वह शिक्षक होने के कारण समय के अभाव मे मेरी माता जी से अक्सर सहायता लिया करते थे। मै देखता था कि मेरी माता जी पुस्तक कला की तरह काग़जो को काट-काट कर चिपकाया तथा अजीब सा बनाया करती थी,जो बाद मे एक समाचार पत्र जैसा लगने लगता,फिर एक चरखे जैसी मशीन मे घुमाकर उसकी फोटो-कॉपिया बनती थी,जब अखबार…

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उर्दू शायरी में ‘बारिश’ : 2

तरुण प्रकाश श्रीवास्तव, सीनियर एग्जीक्यूटिव एडीटर-ICN ग्रुप बारिश, बरसात या सावन – ये केवल झर झर झरते पानी का ही मौसम नहीं है बल्कि ये मदमस्त कर देने वाली सोंधी सोंधी कच्ची खुश्बू का भी मौसम है। यह दुनिया के सभी साहित्यों के सबसे पसंदीदा विषय है।उर्दू शायरी में बरसात के हज़ारों रंग दिखाई पड़ते हैं और कुछ रंग तो इतने पक्के हैं जो सीधे दिल पे अल्पनायें सजा जाते हैं।    निदा फ़ाज़ली उर्दू शायरी के अत्यंत लोकप्रिय शायर हैं। उर्दू की जदीद शायरी में दोहों का शानदार प्रयोग…

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तेज़ गेंदबाज़ी का ख़ौफ और भारत का सबसे तेज़ गेंदबाज़ मोहम्मद निसार

एज़ाज़ क़मर, एसोसिएट एडिटर-ICN नई दिल्ली। यद्यपि उस समय ना तो गति मापने वाला कोई यंत्र होता था और ना ही अपना शरीर बचाने के लिये सुरक्षा के समान (हेल्मेट, चेस्ट गार्ड, एल्बो गार्ड, आर्म्स गार्ड, थाई गार्ड आदि) मुहैया थे,फिर भी उस पीढ़ी के क्रिकेट विशेषज्ञो और पत्रकारो की दृष्टि तथा परख किसी भी तरह से वर्तमान पीढ़ी के लोगो से कम नही होती थी,क्योकि उनकी दूरदर्शिता ने खून की होली खेलने की महत्वकांक्षा के कारण बॉडिलाइन जैसे एक छोटे से कुकर्म को क्रिकेट जगत का कलंक बना दिया…

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