तरुण प्रकाश श्रीवास्तव , सीनियर एग्जीक्यूटिव एडीटर-ICN ग्रुप
(श्रीमद्भागवत गीता का काव्यमय भावानुवाद)
द्वितीय अध्याय (सांख्य योग)
(छंद 15-21)
संजय : (श्लोक 9-10)
हे राजन्, जिसने निद्रा,
पर विजय प्राप्त कर ली थी।
उस अर्जुन की आँखों से,
आँसू की धार बही थी।।(15)
शोकाकुल अर्जुन बोले,
मैं रिपु के हाथ मरूंगा।
पर देव, समर अपनों से
मैं हर्गिज़ नहीं करुंगा।। (16)
फिर हँसे यशोदानंदन,
दोनों दल मध्य खड़े वे।
अर्जुन को तनिक निहारा,
मुस्काये, बोल पड़े वे।। (17)
श्रीकृष्ण : ( श्लोक 11-53)
हे पार्थ, शोक क्या उनका,
वे योग्य शोक के हैं कब।
तेरा है शोक निर्रथक,
है अर्थहीन पीड़ा सब।। (18)
दुख मानव के जीवन का,
विद्वान कहाँ करते हैं।
जो जीवित हैं उनका भी,
उनका भी जो मरते हैं।।(19)
कोई भी काल रहा हो,
मैं, तुम, ये लोग, सभी थे।
आगत में भी सब होंगे,
जो अब हैं और कभी थे।। (20)
जिस भाँति देह को मिलते,
हैं बाल, युवा, वृद्धापन।।
उस तरह जीव को मिलते,
फिर से नवीन काया, तन।।(21)
क्रमशः
-तरुण प्रकाश श्रीवास्तव
विशेष :गीत-गीता, श्रीमद्भागवत गीता का काव्यमय भावानुवाद है तथा इसमें महान् ग्रंथ गीता के समस्त अट्ठारह अध्यायों के 700 श्लोकों का काव्यमय भावानुवाद अलग-अलग प्रकार के छंदों में कुल 700 हिंदी के छंदों में किया गया है। संपूर्ण गीता के काव्यमय भावानुवाद को धारावाहिक के रूप में अपने पाठकों के लिये प्रकाशित करते हुये आई.सी.एन. को अत्यंत प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है।
