दुनिया की गतिशील अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों के नागरिकों में से अधिकांश की मान्यता है कि सत्ताधीशों की कल्याणकारी नीतियों के तमाम दावों के बावजूद जनता को राहत का एहसास नहीं होता।
यहां तक कि 28 देशों में से अधिकांश देशों के बहुसंख्यक नागरिकों की मान्यता है कि कहीं न कहीं इन देशों के सत्ताधीशों की नीतियों में भटकाव की स्थिति है। यूं तो देशकाल- परिस्थिति के अनुसार समस्याओं को लेकर नागरिकों की प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनी इप्सॉस के वैश्विक सर्वे में इन देशों के नागरिकों की प्राथमिक चिंताओं का विवेचन किया गया। इस ऑनलाइन सर्वे के आंकड़ों में इन देशों की तात्कालिक समस्याओं का अक्स उभरकर आया है। भारत में जब यह सर्वे किया गया तो वह पुलवामा हमले के बाद का परिदृश्य था, जिसके चलते सर्वेक्षण में भाग लेने वाले लोगों ने आतंकवाद के चलते सुरक्षा को प्राथमिकता दर्शाया। भारतीय लोगों ने यूं तो सरकार की नीतियों को कई परिप्रेक्ष्य में सही दिशा में माना, लेकिन देश में बेरोजगारी की समस्या को सबसे बड़ी चुनौती बताया। ऐसे लोगों की संख्या अधिक है जो मानते हैं कि सरकार की रोजगार नीतियां विफल रही हैं। इसके अलावा भ्रष्टाचार, अपराध व स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं भी सर्वे में भाग लेने वाले लोगों की प्राथमिकताएं रही हैं।हकीकत है कि अब चाहे दुनिया के तमाम सत्ता संस्थान अपनी लोककल्याणकारी योजनाओं तथा विकास की नीतियों का कितना ही बखान क्यों न कर लें, उससे पहुंचने वाली राहत का प्रतिशत बेहद कम है। प्रचारतंत्र में जो तस्वीर उकेरी जाती है, उसका लाभ हकीकत में नजर नहीं आता। यही वजह है कि फ्रांस, स्पेन, बेल्जियम, तुर्की व दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों के सर्वेक्षण में भाग लेने वाले लोगों का मानना है कि देश के शासकों की नीतियों में भटकाव नजर आता है। सत्ता की नीतियों में सबसे ज्यादा संतुष्टि का भाव चीन में आता है। संभव है साम्यवादी सत्ता का ढांचा कहीं इसके मूल में हो। मगर कमोबेश इन देशों में सत्ताधीशों की कथनी-करनी का अंतर लोगों को कचोटता है। दरअसल, नीतियों को लेकर जो दावे किये जाते हैं, व्यावहारिक धरातल पर वे नजर नहीं आते। वैसे आमतौर पर सभी देशों के नागरिक आतंकवाद, राजनीतिक व प्रशासनिक भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, स्वास्थ्य, अपराधों जैसी समस्याओं को गंभीर चुनौती मानते हैं। वहीं बेरोजगारी की समस्या बड़ी और विश्वव्यापी है और लगातार विकट बनी हुई है। सत्ताधीशों के लिये सर्वेक्षण का निष्कर्ष यह भी है कि जुबानी जमा-खर्च के बजाय नीतियों का लाभ सीधे जनता को मिलता नजर आना चाहिए।

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