सीबीआई के दो आला अफसरों ने जिस तरह एक-दूसरे के ऊपर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया है उससे देश की इस सर्वोच्च जांच एजेंसी की छवि को गहरा धक्का लगा है।
सीबीआई के इतिहास में यह पहला मौका है जब नंबर एक और नंबर दो शीर्ष अधिकारियों ने एक दूसरे के खिलाफ करोड़ों की घूस लेने जैसा संगीन आरोप लगाया है। एक तो पहले से ही सीबीआई साख के संकट से जूझ रही है, ऊपर से इस प्रकरण ने एजेंसी की समस्याग्रस्त स्थिति पर मोहर लगा दी है।तेजी से बदलते घटनाक्रम के बीच देवेंद्र सिंह ने अपने खिलाफ दायर प्राथमिकी को रद्द करने और मामले से जुड़े दस्तावेजों को सौंपे जाने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की।पहले सीबीआई ने अपने ही दूसरे नंबर के अफसर स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना के खिलाफ रिश्वतखोरी के मामले में एफआईआर दर्ज की, फिर नहले पर दहला मारते हुए अस्थाना ने अपने डायरेक्टर आलोक वर्मा पर कई मामलों में करोड़ों रुपये घूस लेने का आरोप लगाया और इसकी लिखित शिकायत कैबिनेट सेक्रेटरी से की।राकेश अस्थाना गुजरात काडर के आइपीएस अफसर हैं। उनके खिलाफ एफआईआर हैदराबाद के एक बिजनसमैन सतीश बाबू सना की शिकायत पर दर्ज हुई है। सतीश बाबू ने आरोप लगाया है कि उन्होंने अपने खिलाफ जांच रोकने के लिए अस्थाना को तीन करोड़ रुपयों की रिश्वत दी। असल में अस्थाना की नियुक्ति को लेकर शुरू से विवाद रहा है। करीब दो साल पहले वह सीबीआई के अंतरिम निदेशक नियुक्त किए गए, तभी वकील और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ने इस नियुक्ति को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी। फिर फरवरी 2017 में आलोक वर्मा सीबीआई के प्रमुख नियुक्त किए गए और कुछ महीने बाद ही उन्होंने बतौर स्पेशल डायरेक्टर अस्थाना की नियुक्ति का यह कहते हुए विरोध किया कि उनके खिलाफ कई संगीन आरोप हैं जिनकी जांच जारी है, इसलिए उन्हें एजेंसी में नहीं होना चाहिए। मोटे तौर पर लगता है कि जांच एजेंसी की कमान मनपसंद अफसर को देने की जिद से ही यह मामला इतना उलझ गया है। सुप्रीम कोर्ट की बार-बार की फटकार और मीडिया व प्रबुद्ध वर्ग की आलोचना के बावजूद सरकार ने सीबीआई को पालतू बनाए रखने का इरादा नहीं छोड़ा है। 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को पालतू तोता कहा था। उसके बाद इसकी कार्यप्रणाली को पारदर्शी बनाने के लिए कई सुझाव सामने आए, जिन्हें लागू करने के दावे भी किए गए। वर्ष 2016 में सीबीआई ने बाकायदा आंकड़े जारी कर अपनी कार्यक्षमता में जबर्दस्त सुधार का दावा किया था, जिसमें खास जोर इस बात पर था कि उसने देश भर में 2200 सीनियर करप्ट सरकारी अफसरों को चिह्नित करके उनके खिलाफ जांच शुरू कर दी है। एक बात तो साफ है कि समस्या सीबीआई की अक्षमता की नहीं, केंद्र के इशारे पर इसके दुरुपयोग की है। फिलहाल एजेंसी की साख को गर्त में जाने से बचाना है तो घूसखोरी के आरोप-प्रत्यारोप में उलझे दोनों अधिकारियों को हकीकत सामने आने तक इसकी शीर्ष जिम्मेदारियों से हटा दिया जाना चाहिए।