तरुण प्रकाश, सीनियर एग्जीक्यूटिव एडीटर-ICN ग्रुप
आखिर एक समाज में पत्रकारिता की क्या भूमिका होनी चाहिए? क्या मात्र तथ्य को तथ्य रूप में प्रस्तुत से और सत्य को सत्य कहने से पत्रकारिता की भूमिका का निर्वहन हो जाता है अथवा पत्रकारिता इससे भी आगे की चीज है?
‘समाज कैसे यात्रा करता है?’ प्रश्न रोचक था लेकिन अत्यंत गंभीर भी। जब यह प्रश्न मेरे सामने आया था तो कुछ देर तक तो मैं मात्र प्रश्न को समझने और उसकी तह में जाने की कोशिश करता रहा और कुछ पलों के गहन आंकलन के पश्चात् एक समाज विज्ञानी की भाँति विचार करने के आधार पर जो कुछ शब्दों में सामने आया, वह कुछ इस प्रकार था,” समाज का औसत स्वरूप एक भेड़ के समकक्ष होता है। यह मात्र या तो अपने आगे चलने वाले का अनुसरण करता है अथवा पीछे से दौड़ाये जाने के कारण आगे बढ़ता है।” अर्थात ‘लालच’ और ‘भय’, दो ऐसे कारक हैं जो किसी भी समाज को गति देते हैं।
‘लालच’ अर्थात आगे बढ़कर विकसित होने की इच्छा अर्थात भविष्य की राह अर्थात् राह दिखाने वाली ‘मशाल’ – यही वह शक्ति है जो एक समाज को आगे बढ़ाने के लिये ज़िम्मेदार है और ‘भय’ अर्थात हारने का डर अर्थात अतीत का त्याग अर्थात आगे दौड़ाने वाली ‘कुल्हाड़ी’ – यही वह मूलभूत कारक है जो समाज को पीछे से धकेलने के लिये आवश्यक है।
अब पहले प्रश्न से भी बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर वह कौन सी वस्तु है जो ‘मशाल’ भी है और “कुल्हाड़ी” भी। वह वस्तु क्या है जो समाज को आगे खींच भी सकती है और पीछे से धकेल भी सकती है। मैंने काफी विचार विमर्श किया तो मुझे स्पष्ट हुआ कि वह वस्तु लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अर्थात मीडिया अर्थात पत्रकारिता ही हो सकती है और तब मैंने महसूस किया कि एक जीवित समाज में मीडिया की कितनी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
जब कोई जीवित समाज और विशेषकर अपना भारत वर्ष संविधान द्वारा स्थापित तीन संस्थाओं अर्थात विधायिका कार्यपालिका और न्यायपालिका के द्वारा एक विकसित समाज स्थापित करने का उद्देश्य पूरा करता है तो लोकतंत्र का यह अलिखित और अदृश्य स्तम्भ मीडिया अर्थात पत्रकारिता न केवल लोकतंत्र के इन तीनों स्तंभों के मध्य एक विशेष प्रकार का समायोजन स्थापित करता है वरन इन तीनों विभिन्न धाराओं के मध्य अंतर्सम्बंध भी स्थापित करता है।
आखिर एक समाज में पत्रकारिता की क्या भूमिका होनी चाहिए? क्या मात्र तथ्य को तथ्य रूप में प्रस्तुत से और सत्य को सत्य कहने से पत्रकारिता की भूमिका का निर्वहन हो जाता है अथवा पत्रकारिता इससे भी आगे की चीज है? सच को सच कहना एक अच्छा गुण तो हो सकता है लेकिन सदैव कल्याणकारी नहीं। क्या मीडिया का उद्देश्य समाज के सामने केवल वास्तविक तथ्य उपस्थित करना है अथवा उन वास्तविक तथ्यों की उपस्थिति के साथ देश के विकास, आध्यात्मिक चेतना, सामाजिक एकता और अखंडता की सकारात्मक दिशा भी तय करनी है? यहाँ एक और महत्वपूर्ण प्रश्न अचानक उठकर खड़ा होता है कि आखिर सच की परिभाषा क्या है? किसी तथ्य का वास्तविक रूप से होना ही सच है या उस तथ्य का कल्याणकारी होना भी आवश्यक है।
जब हम एक मरते हुये व्यक्ति को भी उसके जीवित रहने की उम्मीद को बचाये रखने हेतु हम सब कुछ अच्छा होने का भरोसा दिलाते हैं तो क्या दुनिया का कोई धर्मशास्त्र उसे झूठ समझेगा? कहने का अर्थ सिर्फ़ इतना है कि सत्य जैसे ही कसैला, कर्कश और अमंगलकारी होने लगता है, वह मात्र एक अकल्याणकारी तथ्य बन जाता है और उसका सच समाप्त हो जाता है। जिस प्रकार सत्य के साथ कल्याण आवश्यक रूप से जुड़ा हुआ है, उसी प्रकार मीडिया के साथ सकारात्मक सामाजिक चेतना का योग परम आवश्यक है।
आखिर समाज में लोकतंत्र के चौथे अदृश्य स्तंभ की आवश्यकता क्या है? आखिर क्यों समाज में मीडिया को इतना ऊँचा स्थान दिया जाता है? क्या भूमिका है समाज में मीडिया की? मेरी बड़ी स्पष्ट धारणा है- मीडिया समाज के तीन दृश्यमान स्तंभों अर्थात कार्यपालिका, विधायिका एवं न्यायपालिका का राजवैद्य है। जब इनमें से कोई स्तंभ कमज़ोर अथवा अस्वस्थ होता है, एक राजवैद्य के रूप में मीडिया की भूमिका समाज को स्वस्थ बनाये रखने हेतु प्रारंभ हो जाती है।
किसी भी समाज को दृढ़ता से खड़े रहने के लिये चार पाँवों की आवश्यकता होती है किन्तु हमारा समाज प्रत्यक्ष रूप से तीन संवैधानिक स्तंभों पर खड़ा दिखता है। मीडिया समाज का वह अदृश्य स्तंभ है जिसकी भूमिका इन तीनों स्तंभों के मध्य संतुलन बनाये रखने की है और इसकिये जैसे ही कोई स्तंभ डगमगाने लगे, समाज के हित में मीडिया की ज़िम्मेदारी है कि उसे अतिरिक्त सहारा देने के लिये वह तुरंत प्रस्तुत हो जाये।
जब भटके हुये समाज अथवा उसके किसी संवैधानिक स्तंभ को राह दिखाने की आवश्यकता हो, मीडिया को एक मशाल बन जाना ही चाहिए क्योंकि समाज को सामाजिक चेतना की राह दिखाना उसकी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है और जब समाज में ये संवैधानिक स्तंभ अथवा अन्य कोई असामाजिक तत्व बुराईयों की फसल उगा रहा हो तब मीडिया के पास कुल्हाड़ी बन जाने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प है ही नहीं।
आज का मीडिया स्वयं भटका हुआ है। टी.आर.पी. की अंधी दौड़ में मीडिया निर्मम, निर्दयी और केवल स्वयं से प्रेम करने वाले धूर्त व्यापारियों के हाथों का हथियार मात्र बन कर रह गया है। कहीं-कहीं तो मीडिया तथाकथित लोकतान्त्रिक सड़कों पर चहलकदमी करते स्वतंत्र देश के सभ्य और सुरक्षित नागरिकों की पिक-पाकेटिंग,चेन-स्नैचिंग, बलात्कार से लेकर हत्या तक की सुपारी लेता दिखाई देता है।
हम सब प्रत्येक खबर विशिष्ट मीडिया हाउसेस क उनके अपने आकाओं की दृष्टि से देखने और समझने को विवश हैं। आजकल हम प्रायः समाचारपत्रों एवं दूरदर्शन के न्यूज़ चैनलों पर समाचार नहीं बल्कि किसी विशिष्ट समूह के अपने विचार सुनते हैं। विघटन, आतंक, अवमूल्यन एवं सामाजिक एवं राजनैतिक विद्वेष से रंगी हुई खबरें सिर्फ़ हमें चकरघिन्नी सा नचा तो सकती हैं किन्तु न तो हमें और न ही समाज को कोई मार्गदर्शन दे सकती हैं। यह बिका और खरीदा हुआ मीडिया भला किस तरह से समाज का मरहम हो सकता है जबकि इसमें तो मात्र नश्तर बनने की कला ही उपस्थित है। सत्य तो यह है कि आज मीडिया मशाल तो है किन्तु कदाचित इसका प्रयोग रास्ता दिखाने के लिये नहीं, बस्तियों को जलाने के लिये अधिक हो रहा है।
आज का मीडिया कुल्हाड़ी भी है लेकिन यह विकास के रास्ते में उग आयी जंगली ज़हरीली झाड़ियों को कम, यात्रा करते पदयात्रियों को अधिक काटती है। सच कहा जाये तो व्यवस्था का राजवैद्य आज चांदी की घंटियों की मादक स्वरलहरी सुनने और उस पर अपनी दोनों आँखें बंद कर अपना विकृत नृत्य करने में इतना व्यस्त हो गया है कि वह व्यवस्था की अस्वस्थ शिराओं में औषधि के स्थान पर विष ही भरता जा रहा है।
सभ्यता और संस्कृति के नगर में एक पागल दीवाने की तरह लहराता हुआ यह मदहोश मीडिया देश को किस राह पर ले जा रहा है? देश बार-बार विघटन के कगार पर जा पहुँचता है लेकिन उसकी दरारों को भर सकने में समर्थ मीडिया के सीमेंट में आज मात्र रेत ही रेत बची है। मीडिया की ईमानदारी आज के समय की सबसे बड़ी मांग है और एक ईमानदार मीडिया में ही उस मशाल एवं कुल्हाड़ी के गुण निहित हैं जो समाज का सकारात्मक मार्गदर्शन भी कर सकती है और थके और ठहरे समाज को सहारा देकर विकास की दिशा में आगे भी बढ़ा सकती है।

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