आईये, बुरा मानते हैं …..

तरुण प्रकाश ( सीनियर एसोसिएट एडिटर, ICN ग्रुप )  
भाईसाहब, चलिये, होली तो खत्म हुयी, और साथ ही ‘बुरा न मानने’ की मियाद भी पूरी हुयी। ‘बुरा मानने’ के हमारे सामाजिक अधिकार हमें पूरे राष्ट्रीय सम्मान के साथ वापस मुहैया करा दिये गये हैं । आप चाहें तो अपने इन अधिकारों की विश्वसनीयता, वैधता एवं मारक क्षमता की जांच हेतु अब बड़े आराम से बुरा मान सकते हैं ।
लेकिन प्रश्न आज भी उतना ही बड़ा है जो अपनी उसी पूरी खिसियाहट के साथ तन के खड़ा है कि आप बुरा मान भी  जायेंगे तो कर क्या लेंगे?
जिस प्रकार आनंदित रहना एक कला है, बुरा मानना भी एक महत्वपूर्ण गुण है। बड़े परिवारों में शादी जैसे महत्वपूर्ण अवसर पर कोई  न कोई ‘बुरा मानक’ निकल ही अाता है। अक्सर यह व्यक्ति सबसे सम्मानित जमात का होता है, जैसे दामाद, बहनोई, फूफा, या जीजा और यह प्रजाति (कुछ को छोड़कर ) प्रायः अवसर की तलाश में ही रहती है कि कब आपकी प्रतिष्ठा दांव पर लगे और कब वे बुरा माने। अरे भाई, साधारण दिनों में बुरा मानना भी कोई बुरा मानना होता है। जब तक सारे रिश्तेदार, संबंधी, मेहमान, पड़ोसी और आपके दोस्त यह जान न जायें कि भइय्या जी बुरा मान गये हैं तो भला क्या  फायदा ऐसा बुरा मानने का। यह तो फिर वैसा ही हुआ न कि मुर्गा तो अपनी जान से गया और खाने वाले के होंठ भी तर नहीं हुये।
कभी कभी पड़ोसी भी बुरा मान जाते हैं। मैंने तो कई बार आजमाया है- आप भी आजमा कर देख सकते हैं। एक बार अपने ठीक बगल के पड़ोसी से मैंने मात्र इतना ही कहा था कि भाईसाहब, आप सारा कूड़ा अपने घर के सामने ही डाल देते हैं – सारा दिन गंधाता रहता है। कृपया सड़क पर कूड़ा  न डाला करें । अब मेरा प्यारा पड़ोसी बुरा मानने के अतिरिक्त भला क्या कर सकता था । चहक के बोले,”भाईसाहब, देश को आजाद हुये बरसों बीत गये लेकिन आप तो आज भी कोमा में ही चले आ रहे हैं। कुछ पता-ठिकाना  है भी है आपको। हमारे पास अब पूरी आज़ादी है- चाहे जहाँ कूड़ा डाले। और फिर कूड़ा तो हमने अपने घर के सामने की सड़क पर ही तो डाला है, फिर आपके पेट में क्यों  ऐंठन हो रही है। चले आते हैं एक से!,  मेरे घर के सामने की सड़क मेरी है। हम चाहे जो करें । आप को अच्छा नहीं लगता तो मेरी सड़क मत यूज़ किया कीजिए।” अब आप ही बताएँ, अब एक आज़ाद देश के ज़िम्मेदार नागरिक को आप उसके संविधान प्रदत्त अधिकारों के प्रयोग से रोकेंगे तो बुरा नहीं मानेगा भला ।
पत्नी कब बुरा मान जाये, यह तो साक्षात ईश्वर भी नहीं बता सकता। देखा नहीं आपने, अपनी भोली भाली रानी कैकेयी राजा दशरथ की बात का बुरा क्या मान गयी कि कहानी राम रावण युद्ध तक पहुँच गयी तथा एक बेचारी द्रोपदी हल्का फुल्का क्या बुरा मानी कि महाभारत का महायुद्ध संपन्न हो गया। कलेजे पर हाथ रख कर बताइयेगा – बुरा मानने में आपकी पत्नी को कितनी महारत हासिल है। मेरी वाली तो विधिवत्  पारंगत है। जब आफिस से लौटने मे देर हो जाये तो कहती है कि सरकार ने क्या सारे काम का ठेका तुम्हे ही दे रखा है? और जब मैं किसी तरह किसी दिन घर जल्दी आ जाता हूँ तो कहती है तुम्हें कोई काम काज है कि नहीं ?  कामचोर कहीं के।आलसी अादमी, तू तो जल्दी घर आ आ के बच्चों को भी कामचोरी सिखा देगा।हे भगवान, इसके जैसे आदमी से तो मैं बेवा ही भली।
कुछ लोग देश से बुरा मान जाते हैं और देश से हर रिश्ता तोड़  बड़े दुखी मन से विदेश में सेटेल हो जाते हैं। अरे यहाँ तक कि देश की सी.बी.आई एवं ई.डी. जैसी प्यारी प्यारी संस्थायें इन लोगों को मंगल तिलक लगाकर इनका सम्मान करने के लिये बार-बार तारीख पर तारीख लगाती रह जाती हैं किन्तु विदेशी नीरव धरती पर माल्या (माला) पहने ये बेचारे भोले भाले लोग सिर्फ़ यही गाते रहते हैं – “हम छोड़ चले हैं महफिल को, याद आये कभी तो मत रोना।”
बुरा मानना मानव का एक प्राकृतिक गुण है। कभी कभी इस महत्वपूर्ण गुण के चमत्कारिक परिणाम भी देखने को मिलते हैं। थामस अल्वा एडिसन को बचपन में मंदबुद्धि कह कर स्कूल से निकाल दिया गया जिसका उसने तबियत से बुरा माना और बुरा मानकर दुनिया को बल्ब जला कर दे गया। महाकवि कालिदास ने अपनी खिल्ली उड़ाने वालों का भरपूर  बुरा माना और बुरा मानते हुये संसार को ‘अभिज्ञान शाकुतंलम’, ‘मेघदूतम्’ एवं ‘कुमार संभवम्’ जैसे अद्भुत साहित्यिक ग्रंथ दुनिया को दे गये। अपनी पत्नी की उलाहना का सौ प्रतिशत बुरा मान कर राम बोले तुलसीदास बन गये और संसार को दे गये ‘राम चरित मानस’ जैसा अनुपम ग्रंथ ।
जहाँ धीरु भाई ने अपने अभावों और अत्यंत सीमित साधनों का बुरा मान कर ही ‘रिलायंस’ बना डाला, वहीं अमिताभ बच्चन ने आल इंडिया रेडियो द्वारा स्वर परीक्षा में असफल घोषित होने का जम कर बुरा माना और बुरा मानकर भारतीय सिनेमा के इतिहास में महानायक बन अभूतपूर्व सफलता के सिंहासन पर विराजित हो गये। हिन्दी में तो नहीं मालूम किन्तु अंग्रेजी में तो बहुत पहले कहा जा चुका है कि ‘सक्सेस इज़ दि बेस्ट रिवेंज’। मेरे परम प्रिय मित्र एवं प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक डॉ संजय श्रीवास्तव प्रायः कहते हैं कि ‘बुरा मानना’ ‘प्रशंसा’ से अधिक तीव्रता का उत्प्रेरक है और यदि कोई व्यक्ति अपनी अक्षमताओं एवं अज्ञान का भलीभांति बुरा मान सकने में समर्थ हो सके तो वह चमत्कार कर सकता है।
इसका अर्थ तो यही हुआ कि ‘बुरा न मानने’ के सबसे अनुपयोगी एवं वर्थलेस दिनों की मियाद खत्म हुयी और हम फिर से ‘बुरा मानने’ के अपने प्राकृतिक अधिकार से पुनः  सुसज्जित हो गये हैं। भाईसाहब, साहित्यहित, समाजहित व देशहित में प्लीज़ जम कर बुरा मानिये।

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