तरुण प्रकाश श्रीवास्तव, सीनियर एग्जीक्यूटिव एडीटर-ICN ग्रुप कहानी लैंप का प्रकाश तीव्र कर दिया मैंने। प्रकाश की ज्योति स्थूलकाय हो वातावरण से चिपक गयी। कुछ विचित्र सा अनुभव कर रहा था मैं इधर कुछ दिनों से। प्रतीत होता था – दीमक सी लग गयी हो जीवन की पुस्तक में …. या पुस्तक के पृष्ठ चिंदी-चिंदी होकर हवाओं में उड़ रहे हों। वास्तव में जीवन ही कठिन है और जब दर्द का आवरण उस पर आ पड़ता है तो वह और भी कठिन हो जाता है। संघर्ष करता रहा हूँ अपने…
Read MoreCategory: साहित्य
मन उतना ही गीत तृप्ति के गायेगा
तरुण प्रकाश श्रीवास्तव , सीनियर एग्जीक्यूटिव एडीटर-ICN ग्रुप तन जितना तृष्णा-तृष्णा चिल्लायेगा । मन उतना ही गीत तृप्ति के गायेगा ।। नाखूनों से देह खुरच कर जीवन भर, काल निरंतर मूक कहानी लिखता है । बाल सुलभ, यौवन मय और बुढ़ापे के, हर स्तर पर चित्र नया ही दिखता है ।। तन की चादर झीनी होती जाएगी , मन लेकिन हर बार युवा रह जायेगा । तन का क्या आना, क्या जाना, मिथ्या है, मन का ही यौवन तन पर आ मिलता है । मन के रोने से ही आँखें…
Read Moreनकारात्मक बनाम सकारात्मक
सुहैल काकोरवी, लिटरेरी एडिटर-ICN ग्रुप (इस कविता का आधार मरीज़ों की निगेटिव रिपोर्ट आना है और निगेटिव बस यहीं सफल है) मोहब्बत करने वालों के लिए ये आम है लोगों किसी की इक “नहीं” तो रोज़ उसका काम लोगों अज़ीयत देना और बर्बाद करना हुस्न की आदत कि इसको क्या किया जाए यही तो उनकी है फितरत सदा इंकार से ही हिज्र का हंगाम होता है इसी से कल्बे आशिक़ का बुरा अंजाम होता है कि है इंकार आतिश जो सुकूने दिल जलाती है ये है तूफ़ान जिसमें हर मसर्रत…
Read Moreकैंसर
अखिलेश कुमार श्रीवास्तव ‘चमन’, सेवानिवृत्त अधिकारी एवं लिटरेरी एडिटर-ICN हिंदी कहानी और अब आगे जैसे-जैसे समय बीतता गया बंटी और नूरी जी, जान से एक-दूसरे पर न्यौछावर होते चले गए। जितनी भी देर स्कूल में रहते उन दोनों का उठना-बैठना, खाना-पीना, खेलना- कूदना, सब कुछ साथ ही होता था। लेकिन स्कूल से बाहर निकलते ही वे दोनों एक-दूसरे के लिए बिल्कुल अजनवी बन जाते थे। मम्मियों के द्वारा लगायी गयी पाबन्दियों का असर यह हुआ कि वे दोनों बच्चे अब बड़ी सफाई से झूठ बोलना सीख गए। नूरी की मम्मी…
Read Moreज़ुल्म की परछाइयां
अमिताभ दीक्षित, एडिटर-ICN U.P. हर तरफ हैं जुल्म की परछाइयां। घेर लेती हैं हमें रुसवाइयाँ ।। क्यों न बदलेगा लिबास-ए-जुस्तजू। पूछती हैं गौर से तनहाइयाँ।। पाँव में ले के हिनाई आरजू। बेसबब क्यों फिर रही अंगड़ाइयाँ।। रोज माथे की लकीरों से जिरह। उम्र को आवाज़ दें रानाइयाँ।। डूबने वाले को क्या क्या चाहिये। पूछती हैं रिन्द की गहराइयाँ।।
Read Moreज़िन्दगी चलती रहेगी
तरुण प्रकाश श्रीवास्तव, सीनियर एग्जीक्यूटिव एडीटर-ICN ग्रुप हम रुकें चाहे ठिठक कर, बैठ जाएँ, या, बहक कर ज़िन्दगी चलती रही है, ज़िन्दगी चलती रहेगी । (1) रात आने से कभी क्या. दिन निकलना भूलता है। वर्ष के वट पर नया इक, नित्य मौसम झूलता है।। शुष्क मौसम खींच कर, लाता हमेशा मुक्त सावन, नित्य मुरझाती हैं कलियाँ, नित्य पल्लव फूलता है।। कैद हम हो जाएँ घर में, या रुकें थक कर सफ़र में, ज़िन्दगी चलती रही है, ज़िन्दगी चलती रहेगी । (2) आँख खुलना, बंद होना, मात्र जीना…
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अखिलेश कुमार श्रीवास्तव ‘चमन’, सेवानिवृत्त अधिकारी एवं लिटरेरी एडिटर-ICN हिंदी कहानी ‘‘अच्छा ये बताओ…..नूरी नाम तुम्हें कैसा लगता है….?’’ अचानक ही बातचीत का विषयान्तर कर के अमोल ने प्रश्न किया। ‘‘नूरी….? अच्छा नाम है…बहुत अच्छा….। लेकिन बात क्या है….?’’ रजिया ने चैंक कर पूछा । ‘‘यह नाम नूरी पसन्द है तुमको…?’’ ‘‘अरे बाबा…..कहा तो मैंने कि बहुत अच्छा….प्यारा सा नाम है यह। लेकिन माजरा क्या है….? अचानक कबाब में हड्डी की तरह यह बात कहाॅं से आ…
Read Moreउर्दू शायरी में ‘समंदर’
तरुण प्रकाश श्रीवास्तव, सीनियर एग्जीक्यूटिव एडीटर-ICN ग्रुप समंदर विशाल भी है और गहरा भी। सारी दुनिया में लगभग इकहत्तर प्रतिशत हिस्से पर समंदर का एकछत्र राज है। समंदर शांत भी है और तूफ़ानी भी। समंदर जहाँ सदियों से प्यासा है, वहीं हजारों नदियों को लगातार पी भी रहा है। बहुत ही रहस्यमयी शय है यह समंदर भी। जब यह शांत होता है तो दुनिया में इससे खूबसूरत कुछ भी नहीं और जब यह नाराज़ होता है तो शायद इससे डरावना भी कुछ नहीं। न जाने कितने ही फ़साने जुड़े हैं…
Read Moreग़ज़ल: ज़द पे हैं मेरी तमन्नाएँ न जाने कब से
सुहैल काकोरवी, लिटरेरी एडिटर-ICN ग्रुप ज़द पे हैं मेरी तमन्नाएँ न जाने कब से हो रहे हैं वो खता उसके निशाने कब से MY DESIRES ARE ON TARGET OF HER SINCE LONG THEY HAVE BEEN MISSING AIM INCESSANTLY वक़्त बदला है अचानक तो मिली मुझको मुराद कर रहा था वो कई मुझसे बहाने कब से TIME CHANGED AND FULFILLED MY LONGING SHE HAS BEEN EYE WASHING SINCE LONG दस्ते गुलरंग से जारी है वहां बूए वफ़ा जिस्म से मेरे अलग हैं मेरे शाने कब से HER COLOURFUL HANDS RELEASE PERFUME…
Read More“मिलकर“
सी. पी. सिंह, एडीटर-ICN ग्रुप चाहे -जैसी -भी – विपदा -हो -हम -पर ? हम, जीत -ही -जाएँगे ? हर – दुश्मन – से – लड़ेंगे – मिलकर ? जीतेंगे , फिर – गाएँगे ?? आ – गया – ये – कोरोना – जाने – कहाँ – से – ज्यों – खल ? जग – रुक – गया – सचमुच , कुछ – भी – तो – न – चल ? क्या , इस – दशा – में – भी , ये – जग – जाएगा – ढल ? जो…
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