अमिताभ दीक्षित ,लिटरेरी एडिटर-ICN ग्रुप नदी भटकती है विकल बहती है अविरल नदी नहीं जानती वह क्यों भटकती है क्यों बहती है उमड़े घुमड़े बादलों की सन्तानों को अपने आंचल से ढके छिपाये उनकी सांसों को अपने सीने में समाये ममता की चादर सबको ओढ़ाये नदी गुज़रती है कितने ऊँचे नीचे रास्तों से नदी नहीं जानती वह क्यों गुज़रती है नदी बांटती है वन देती है जीवन नदी का आंचल कितना बड़ा है सभ्यताओं का जंगल उसी पर खड़ा है नदी प्रकाश, नदी छाया है नदी ज्ञान, नदी माया है…
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जयपुर
अमिताभ दीक्षित ,लिटरेरी एडिटर-ICN ग्रुप एक बार कुछ खण्डहर हो गई इमारतें आपस में बतियाने लगीं उनकी बातें हवाओं ने सुन ली और कानां कान खबर लोगों तक पहुँची लोग दौड़े आए, बेतहाशा और एक शहर फिर से बस गया – जयपुर पत्थरों की कानाफूसी हवाओं की संगदिली इंसान के कारोबारी हाथ सब एक जगह इकट्ठा हो गए राजपूती शान के साए में इतिहास का नकदीकरण है यह शहर वक़्त खामोशी से सुनता रहा छीजता रहा –…
Read Moreज्ञानपीठ अवॉर्ड से सम्मानित मशहूर लेखिका कृष्णा सोबती अपने जीवन के आखिरी वर्षों तक साहित्यिक कार्यों से जुड़ी रहीं
नई दिल्ली। प्रसिद्ध साहित्यकार और ज्ञानपीठ अवॉर्ड से सम्मानित कृष्णा सोबती का निधन हो गया। 18 फरवरी 1925 को वर्तमान पाकिस्तान के एक कस्बे में सोबती का जन्म हुआ था। उन्होंने अपनी रचनाओं में महिला सशक्तिकरण और स्त्री जीवन की जटिलताओं का जिक्र किया था। सोबती को राजनीति-सामाजिक मुद्दों पर अपनी मुखर राय के लिए भी जाना जाता है।उनके उपन्यास मित्रो मरजानी को हिंदी साहित्य में महिला मन के अनुसार लिखी गई बोल्ड रचनाओं में गिना जाता है। 2015 में देश में असहिष्णुता के माहौल से नाराज होकर उन्होंने अपना…
Read Moreमौसम की तरह रंग बदलती है दोस्ती
अमिताभ दीक्षित ,लिटरेरी एडिटर-ICN मौसम की तरह रंग बदलती है दोस्ती। कुछ ठोकरें खाकर ही संभलती है दोस्ती ।। आग़ाज-ओ-अंजाम के चेहरे लिए हुए। हर एक तमन्ना पे मचलती है दोस्ती।। रुसवाइयां बहुत हैं किसका यकीं करें। ग़फलत की शक्ल ले के पिघलती है दोस्ती।। रंजिश की बस्तियों में इक घर बसा लिया। शम्मा की तरह रोज़ ही जलती है दोस्ती।। बन जाती ज़िन्दगी है ज़िन्दादिली का नाम। राह-ए-वफा पे जब भी निकलती है दोस्ती।।
Read Moreअलवर
अमिताभ दीक्षित ,लिटरेरी एडिटर-ICN ग्रुप तमाम उम्र ज़िन्दगी की ख़ाक छानता वक़्त से बातें करता एक बूढ़ा झुर्रियोंदार चेहरा उदासी की देहरी लांघती आंखों में सपने जैसा बसा यह शहर अलवर अंधियारी रात में दूर टिमटिमाता दिया एक पूरी दास्तान छिपाये है अपने पीछे एक अलसाये लावण्य की, वीरता की और रंगभरी मस्तियों की ख़ामोशी जब ख़ुद से बातें करती है तभी यह शहर अचानक नींद से जाग उठता है सुर्खियां इसकी आदत में शुमार नहीं सुबह की पहली किरण के साथ तेज़ हो जाती हैं कुयें की धिर्री की…
Read Moreआंकड़ें जीवन नहीं होते
तरुण प्रकाश, सीनियर एग्जीक्यूटिव एडीटर-ICN ग्रुप जैसे सारे कोमल कोमल बच्चे बन गये हैं उस बड़ी मशीन के छोटे छोटे पुर्जे जिसमें पहले से ही भरा है दुनिया का समूचा प्रबंध तंत्र! ओह! यह कैसा छल है, यह कैसा षड्यंत्र!! इस मशीन में भरा जाता है बचपन और किशोरावस्था के स्वप्नों का ताजा लहू, मुलामियत से भरी लचीली देह के, सूख कर लकड़ी बन जाने तक का पूर्व नियोजित श्रम और नित्य की अरुचिकर जूझन एवं उनसे उपजी हताशा और निराशा और बदले में मशीन उगलती है मात्र असीमित प्रोद्योगिकी और…
Read Moreज़िन्दगी फुटपाथ पर
अमिताभ दीक्षित ,लिटरेरी एडिटर-ICN ग्रुप मेरे छू देने से जो सरासरा सी उठती है तमन्ना है कि उसके जानिब कोई अफसाना कहूं कुछ ऐसी बात बहुत नजदीक से छू ले उसे कुछ ऐसे लफ्ज़ जो जा बैठे हैं उसकी पलकों पर पंछियों के शोर से सुबह की सुगबुगाहट आए नींद अभी बाकी हो लैंप पोस्ट बुझ जाए और जिंदगी उनींदी सी करवट बदल के सो जाए……….थोड़ी देर और……….. थोड़ी देर बाद फिर ताके यूं टुकुर टुकुर डूबते तारों की चमक आंखें मिचियाए बुरा सा मुंह बना के उठ बैठे फेंक के चादर कूद चारपाई से तेज कदमों…
Read Moreमोसूल
अमिताभ दीक्षित ,लिटरेरी एडिटर-ICN ग्रुप यह महानगर एक दीवार है खंडहरों की जिसके उस पार डूब जाता है सूरज हर रोज़ गहरे काले स्याह अँधेरे चट्टानों की मानिंद खड़े हो जाते हैं आँखों में हर रोज़ बस्तियां न खुद से बात करती हैं न खामोशी से धुआं भरे कसैले जुबां के जायके इंतज़ार करते हैं निवालों का कोई कुछ नहीं कहता मगर डरता है सन्नाटों से ……और धमाकों से अब भी उसूलों के लिए लड़ी जा रही जंग में कोई उसूल बचा नहीं रह गया चीखें ………………..नहीं सिसकियाँ ……………..नहीं मरती…
Read Moreम्यूजियम में चाँद
अमिताभ दीक्षित ,लिटरेरी एडिटर-ICN ग्रुप “कहते हैं पिछली सदी का चांद इस सदी जैसा नहीं था” एक बोला “नहीं बिल्कुल ऐसा ही था” दूसरे ने पहले की बात काटी “तुम्हें कैसे मालूम है” पहले ने पूछा “मैंने म्यूजियम में देखा था” दूसरे ने बताया “वहां चांद कहां से आया” पहले ने पूछा “यह मुझे क्या पता” दूसरा बोला “तुमने किस म्यूजियम में देखा था” पहले ने फिर सवाल किया “सरकारी म्यूजियम में” दूसरे ने अपनी जानकारी जाहिर की “चलो वही चलते हैं चलोगे “ पहले ने चलने की तैयारी करते हुए…
Read Moreनए वर्ष की पहली सुबह जैसा
अमिताभ दीक्षित ,लिटरेरी एडिटर-ICNग्रुप चीखने लगता हो वक़्त खामोशी की दीवारों पर दस्तक देते देते पर दिलों का सन्नाटा फिर भी न टूटता हो शोर इतना कि सब कुछ उसी में समाने लगे फिर भी कानों में बजती रहे सीटियां बंद हो जाए बादलों में आकारों का बनना दृष्टि होती जाए क्षीण और गंतव्य दूर और दूर नज़र आए खुली रहें फिर भी शून्य में ताकती आंखें हवा में ज़रा भी खुशबू बाकी ना रह जाए फेफड़े भी करने लगे इनकार कुछ भी अपने भीतर समेटने से फिर भी चलती…
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