चेहरे पे आरज़ू के अजब रंगो नूर था

By: Suhail Kakorvi  सुहेल काकोरवी की ग़ज़ल (ज़मीने ग़ालिब पर) चेहरे पे आरज़ू के अजब रंगो नूर था इख़फ़ा का आज वादए हुस्ने ज़हूर था Upon the face of desire, there were unique colors and light The Latent Divine intends to expose what is excessively bright कुछ भी कहे वो इसलिए उलझन में ही रहा वो चाहता नहीं था मगर मुझसे दूर था Let her say anything bit different is the reality Remains away from me when does not wish she उसके करम से दीद हुई मेरी कामयाब हिम्मत शिकन…

Read More

समय का गीत: 5

तरुण प्रकाश श्रीवास्तव, सीनियर एग्जीक्यूटिव एडीटर-ICN ग्रुप मैं समय के सिंधु तट पर आ खड़ा हूँ, पढ़ रहा हूँ रेत पर, मिटते मिटाते लेख, जो बाँचे समय ने।   शेक्सपीयर, जॉन मिल्टन, कीट्स, शैली बोलते हैं। आज भी वुड्सवर्थ अपनी पुस्तकें खुद खोलते हैं।। गोर्की की “माँ” अभी भी जागती है पुस्तकों में। गू़ँजते हैं शेर ग़ालिब के अभी तक महफ़िलों में।।   ‘सूरसागर’ सूर गाते, गूँजते कबिरा के ‘निर्गुन’। और मीरा के पदों में कृष्ण वंशी की सहज धुन।। सौंपते ‘मानस’ जगत को,भक्त तुलसी राम के हैं। छंद तो…

Read More

कुछ ऐसे ही चलते चलते वो रुक गए होंगे

By : श्रेय शेखर  कुछ ऐसे ही चलते चलते वो रुक गए होंगे पैदल चल कर यक़ीनन थक गए होंगे,, कल फिर से कुछ दूर निकल जाएंगे ये सोच कर रात में ठहर गए होंगे।। कोई दहलीज़ नहीं लांघी थी कोई घर द्वार नहीं भूला था,, वो माँ जो गाँव में रह रही है उसके बाँहों में आख़िरी बार झूला था।। आज भी सब याद करते होंगे उसकी ही बात करते होंगे,, अभी कल ही तो बात हुई होगी यह सोच कर विलाप करते होंगे।।

Read More

माँ की सूचना।

By: C.P. Singh, Literary Editor-ICN Group मेरे- आंसू, दूर देश में, जब गिरे धरती- माँ पर । बिन- चिट्ठी, दुःख- सूचित-माँ का, घर में भीगा- आँचल । माँ, मेरी-जननी- बनि, दुख- सहती- जीवन- भर । संतति को खुशियाँ मिलें, जप- करती- जीवन- भर । निज- उसका, कुछ भी नहीं,सब- निर्भर- जातक- पर । बच्चे का –मन- मुदित देखकर, खुश रहती ममता भर । मेरे- आंसू, दूर देश में, जब गिरे धरती- माँ पर । धरती- माँ, धरती हमें, निज- अंकन- जीवन- भर । हम कुछ भी उस पर करें, सब…

Read More

समय का गीत: 4

तरुण प्रकाश श्रीवास्तव, सीनियर एग्जीक्यूटिव एडीटर-ICN ग्रुप मैं समय के सिंधु तट पर आ खड़ा हूँ, पढ़ रहा हूँ रेत पर, मिटते मिटाते लेख, जो बाँचे समय ने।   क्रूर यवनों ने किये थे आक्रमण भारत धरा पर। जीतने को विश्व था यूनान से निकला सिकंदर ।। वीर पोरस को हरा कर मान निज उसने बढ़ाया। पर मगध में मौर्य वंशी वीर ने उसको हराया।।   शाक्य, हूणों ने अनेकों देश पर हमले किये थे। वंशजों ने जाम शासन के यहाँ सदियों पिये थे।। जान कब बख्शी अरब, मंगोल, फिर…

Read More

जननी-दिवस ( मदर्स-डे )

By: C.P. Singh, Literary Editor-ICN Group मेरा  भी  बहुत  मन  करता  है कि  मै  अपनी  माँ  की  फोटो  सबको  दिखाऊँ | जगह – जगह प्रकाशित  करवाऊँ | परन्तु मैं ऐसा नहीं कर पाता क्योंकि मेरी माँ तो मेरा  बचपन सुधार कर चली गयी और मेरे पास एक भी फोटो नहीं है मेरी माँ की | मेरे मन  में , मेरे ह्रदय में , मेरी सोंच में और मेरी आँखों में मेरी माँ की वह सारी छवियाँ हैं , जो  मैंने देखीं , उतनी उमर में | फिर भी उनमें से…

Read More

डीयर महतारी….

आकृति विज्ञा ‘अर्पण’, असिस्टेंट ब्यूरो चीफ-ICN U.P. गोरखपुर: असही डांट के सुबेरे जगाती रहो ,दिन बन जाता है मेरा। असल में महतारी शब्द जादुई शब्द है ये प्लेसेंटल रिलेशन बाकमाल है ,बिना कहे बूझने वाली जादूगर कहो या फिर बड़ा से बड़ा झूठ ट्रेस करने वाली डिटेक्टर। हम तो भैया हरदम असही लड़ते भिड़ते मनाते मनवाते रिसियाते कोहाते मोहाते मनुआते देखना चाहते हैं। कब्बो कब्बो हम गजबे कुंभकर्ण अवस्था में जाते हैं और इस अप्रतिम दृश्य को बस महतारिये झेल सकती हैं ,बाकि कौनो तकिया पर भउरा रख देगा। अनकंडीशनल…

Read More

समय का गीत: 3

तरुण प्रकाश श्रीवास्तव, सीनियर एग्जीक्यूटिव एडीटर-ICN ग्रुप मैं समय के सिंधु तट पर आ खड़ा हूँ, पढ़ रहा हूँ रेत पर, मिटते मिटाते लेख, जो बाँचे समय ने।   वो भगीरथ की तपस्या, और वो अद्भुत कमंडल। वेग था जिसमें समाया साथ लेकर स्वर्ग का जल।। और फिर शिव शीश पर उतरी महा गंगा निनादी । तर गये पुरखे, धरा पर धार अमृत की बहा दी।।   राम ने ले जन्म, लक्ष्मण साथ दानव दैत्य तारे। भूमिजा को वारि, पापी नाश, रावण कुल संहारे।। राम का था राज्य अद्भुत, थे…

Read More

उर्दू शायरी में ‘बचपन’ और ‘बच्चे’

तरुण प्रकाश श्रीवास्तव, सीनियर एग्जीक्यूटिव एडीटर-ICN ग्रुप  शायद ही दुनिया का ऐसा कोई व्यक्ति हो जिसे बचपन न भाता हो। हर व्यक्ति बड़ी हसरत से अपने बचपन को याद करता है। बचपन ज़िंदगी का वह खूबसूरत हिस्सा है जहाँ हर व्यक्ति खूबसूरत सपने देखता हेै और उसे विश्वास होता हेै कि यह सारी दुनिया उसकी मुट्ठी में है। बचपन जितना हसीन होता हेै, उतना ही ताज़ा भी।  बच्चे हर व्यक्ति की कमज़ोरी हैं। सिर्फ़ अपने ही नहीं, बच्चे सभी के प्यारे लगते हैं। यहाँ तक कि सिर्फ़ इंसान के ही…

Read More

सुनों बसंती हील उतारो,अपने मन की कील उतारो

आकृति विज्ञा ‘अर्पण’, असिस्टेंट ब्यूरो चीफ-ICN U.P. सुनों बसंती हील उतारो अपने मन की कील उतारो नंगे पैर चलो धरती पर बंजर पथ पर झील उतारो जिनको तुम नाटी लगती हो उनकी आँखें रोगग्रस्त हैं उन्हें ज़रूरत है इलाज की ख़ुद अपने से लोग ग्रस्त हैं सच कहती हूँ सुनो साँवली तुमसे ही तो रंग मिले सब जब ऊँचे स्वर में हँसती हो मानो सूखे फूल खिले सब बिखरे बाल बनाती हो जब पिन को आड़ा तिरछा करके आस पास की सब चीज़ों को रख देती हो अच्छा करके मुझे…

Read More