By: C.P. Singh, Editor-ICN Group आंख के आंसू पोंछि मेरी माँ, होंठो से मुस्काई है । जिमि खिलती शुभ धूप की गरिमा, नभ में बदरी छाई है । पन थककर, माँ के कन्धों से, पावन –पग तक आया है । त्याग और ममता बन्धों से, भरी जननी की काया है । करम- धरम के तट-बन्धों से, प्रेरित लौकिक छाया है । बच्चे- घर- दैनिक धन्धों से, मन उसका भरमाया है । घडी की सुई सी चलती मेरी माँ, रोई ना हरसाई है । आंख के आंसू पोंछि मेरी माँ, होंठो…
Read MoreCategory: साहित्य
समय का गीत: 10
तरुण प्रकाश श्रीवास्तव, सीनियर एग्जीक्यूटिव एडीटर-ICN ग्रुप मैं समय के सिंधु तट पर आ खड़ा हूँ, पढ़ रहा हूँ रेत पर, मिटते मिटाते लेख, जो बाँचे समय ने। है समय अदृश्य लेकिन दृश्य है अनुपम रचाता। सिर्फ़ साक्षी है मगर, इतिहास है इसमें समाता।। यह बिना आवाज़ के ही शून्य में है गीत गाता। यह नचाता है, मिटाता है, हँसाता है, रुलाता।। है समय अद्भुत, अनोखा, कौन इसको जान पाया। एक में निर्माण, दूजे हाथ में विध्वंस लाया।। युद्ध भी यह, बुद्ध भी यह, नीर भी है, ज्वाल…
Read Moreसमय का गीत: 9
तरुण प्रकाश श्रीवास्तव, सीनियर एग्जीक्यूटिव एडीटर-ICN ग्रुप मैं समय के सिंधु तट पर आ खड़ा हूँ, पढ़ रहा हूँ रेत पर, मिटते मिटाते लेख, जो बाँचे समय ने। स्वर लहर मोज़ार्ट की, वह नृत्य माइकल जैक्सन का। तान बिसिमिल्लाह की थी दिव्य, सुर मेंहदी हसन का।। वो रफ़ी, आशा, लता के गीत का जादू निराला। हर ह्रदय में भर दिया जगजीत के स्वर ने उजाला।। आज डाविंची, पिकासो, तूलिका से झांकते है। और रवि वर्मा, मदन नागर, कला को आँकते हैं।। शिल्प माइकल एंजलो का आज भी खुद…
Read Moreस्वस्थ विश्लेषण जरूरी है
आकृति विज्ञा ‘अर्पण’, असिस्टेंट ब्यूरो चीफ-ICN U.P. एक माँ ने सड़क पर बच्चा जना है कुछ लोग इस पर करेंगे सियासत…. कुछ लोग होंगे इतने निष्ठुर कि कह पड़ेंगे कि क्या जरूरत थी सड़क पर चलने की… बहुत जरूरी है पीड़ित को महसूसना उतारकर पूर्वाग्रह के चोले…. आपका समर्थन तंत्र हेतु ऐसा भी न हो कि न गिना सकें कमियां…… वहीं विरोध भी ऐसा न हो कि नजर न आये अच्छाइयां… हर घटनाओं में शामिल होते हैं कुछ स्वार्थी लोग लेकिन भुगतते हैं निस्वार्थ लोग….. पीड़ा तब बढ़ जाती है…
Read Moreसमय का गीत: 8
तरुण प्रकाश श्रीवास्तव, सीनियर एग्जीक्यूटिव एडीटर-ICN ग्रुप मैं समय के सिंधु तट पर आ खड़ा हूँ, पढ़ रहा हूँ रेत पर, मिटते मिटाते लेख, जो बाँचे समय ने। हैं समय के भेद गहरे, शून्य है क्या क्या छिपाये। है जगत कितना अनूठा, किंतु हम कब जान पाये।। था कहा गैगोलियो ने, है धरा फुटबॉल जैसी । सिद्ध न्यूटन ने किया, गति की जगत में रीति कैसी।। बेंज़ ने दे कार कर दी पूर्ण गति की खूब हसरत। वायु में उड़ने लगा, इंसान राईट की बदौलत।। आइंस्टाइन ने दिया…
Read Moreमां-थी, प्रभु–सी
By: C.P. Singh, Literary Editor-ICN Group एक वो- दिन थे, मां थी – प्रभु सी, तन- मन, दुःख से परे । अब तो सुधि है, निधि सी उसकी, सकल- कलेश – भरे । एक वो दिन थे, कुछ भी जिद की, मां –भण्डार –भरे । अब तो लगे, हूं- हठ- प्रकृति की, मां- हित- नयन- झरे । एक वो दिन थे, गोद में मां की, जग के सुख- सगरे । अब तो तन चले, कृपा उसी की, को – कहां- रुहठि करें ? एक वो दिन थे, मां- रक्षक थी,…
Read Moreमैं और मेरी कविता
आकृति विज्ञा ‘अर्पण’, असिस्टेंट ब्यूरो चीफ-ICN U.P. बहुत देर तक मेरी कविता मेरे साथ टहलती रही हम दोनों ने ख़ूब बातें की तुम्हारी बात आते ही झगड़ गये हम दोनो फिर दोनो ख़ामोश थे….. आज तक कायम है ख़ामोशी मुझको मनाना चाहती है वो उसे मनाना चाहती हूँ मैं मेरे पास छूट गयी है उसकी लय वो ले गयी है मेरा बिखरना….. इन दिनो चाँद तारे सब बनाते हैं समद्विबाहु त्रिभुज एक दूसरे को सोचकर मौन हैं आधार के दोनो कोनों पर टिकी सी मैं और मेरी कविता……. मैं देखती…
Read Moreसमय का गीत: 7
तरुण प्रकाश श्रीवास्तव, सीनियर एग्जीक्यूटिव एडीटर-ICN ग्रुप मैं समय के सिंधु तट पर आ खड़ा हूँ, पढ़ रहा हूँ रेत पर, मिटते मिटाते लेख, जो बाँचे समय ने। बाग वो जलियानवाला, गोलियों की सनसनाहट। क्रूर नरसंहार, मौतें, खून, चीखें, छटपटाहट।। मौत थी आज़ाद ने चूमी, भगत फाँसी चढ़े थे। लोग गाँधी की डगर पर, एकजुट होकर बढ़े थे।। खून का था पर्व जिसके मध्य भारत बँट गया था। एक टुकड़ा देश, पाकिस्तान बन कर कट गया था।। गोलियाँ खा वक्ष पर, चुप हो गये निर्भीक गाँधी। विश्व रोया…
Read Moreसमय का गीत: 6
तरुण प्रकाश श्रीवास्तव, सीनियर एग्जीक्यूटिव एडीटर-ICN ग्रुप मैं समय के सिंधु तट पर आ खड़ा हूँ, पढ़ रहा हूँ रेत पर, मिटते मिटाते लेख, जो बाँचे समय ने। काल ने देखे हज़ारों युद्ध यूँ तो रक्तरंजित। जंग ऐसी भी छिड़ी जिसमें हुआ यह विश्व खंडित।। वैश्विक था युद्ध पहला, उम्र बावन माह की थी। लड़ रहा था विश्व सारा, ऋतु भयानक दाह की थी।। दूसरा भी युद्ध वैश्विक था, भयानक वो समर था। कौन था दुनिया में जो इसके असर से बेअसर था।। दो शहर जापान के बलि…
Read Moreउर्दू शायरी में ‘ज़िंदगी’
तरुण प्रकाश श्रीवास्तव, सीनियर एग्जीक्यूटिव एडीटर-ICN ग्रुप ‘ज़िंदगी’ एक बहुत ही खूबसूरत अहसास है और शायद इंसान की सबसे बड़ी ज़रुरत भी। सारी दुनिया इसी ‘ज़िंदगी’ नाम की एक शय के बदौलत ही चल रही है। सच कहा जाये तो इस ‘दुनिया’ रूपी गाड़ी में ‘ज़िंदगी’ नाम का ही ईंधन का प्रयोग होता है। और इसकी खूबी भी देखिये, हज़ारों शिकायतों के बावजूद भी हर इंसान अपने दोनों हाथों से अपनी ज़िंदगी को कस कर पकड़े हुये है कि वक़्त के बहाव में वह उसके हाथों से कहीं छूट न…
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