उर्दू शायरी में ‘चेहरा’ : 3

तरुण प्रकाश श्रीवास्तव, सीनियर एग्जीक्यूटिव एडीटर-ICN ग्रुप 

कितना ज़रूरी होता है हर एक के लिये एक अदद चेहरा यानी सूरत यानी शक्ल यानी रुख़। कभी- कभी सोचता हूँ कि अगर यह दुनिया ‘बेचेहरा’ होती तो क्या होता। इस बेचेहरा दुनिया में कौन किसको पहचानता और कौन किसको याद रखता।

भला बिना पहचान की वह दुनिया कैसी होती। कितनी दुर्घटनाएं होतीं, कितने हादसे होते। सवेरे कोई किसी के साथ होता तो शाम को किसी के साथ। सिलीब्रटीज़ के बड़े-बड़े पोस्टर्स में आखिर क्या दिखाया जाता? पुलिस भला किसकी रपट लिखती और किसको पकड़ती? रिंद किसकी आँखों के मयखाने में डुबकियाँ लगाते और शायर किसके लबों में ‘दो पंखुड़ी गुलाब की’ ढूंढते? शायद हम एक दूसरे की गंध से एक दूसरे को पहचानते लेकिन जहाँ लोग चेहरे बदलने में उस्ताद हो गये हैं वहाँ भला गंध की क्या बिसात। दिन में चमेली की खुश्बू लुटाने वाले रात में गुलाब में सराबोर होने से क्या भला गुरेज़ करते? हमारी भिन्नताओं और हमारे अलग-अलग व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पहचान हमारा चेहरा ही है। हमारा चेहरा ही मनुष्य व जानवरों के बीच का सबसे बड़ा अंतर भी है। हर मनुष्य का अपना एक चेहरा है जो उसका नितांत अपना है जबकि हर जानवर का चेहरा लगभग एक जैसा है।

चेहरे में भी तमाम तिलिस्म छिपे हैं। किसी के पास चेहरों की भीड़ है तो कोई चेहरा भीड़ में भी अकेला है। कोई चेहरा किताब जैसा पढ़ा जा सकता है तो कोई ऐसा भी है जिसके भावों को समझने के लिये हज़ारों किताबों को पढ़ना पड़ता है। कोई चेहरा आपको अपने अंदर तक झाँकने की अनुमति देता है तो किसी का चेहरा दर्पण जैसा है जो सिर्फ़ आपका ही अक़्स आपके सामने पेश करता है।

चेहरों और सूरतों की यह दुनिया विचित्र है। कोई चेहरा सपनों में भी आकर डराता है तो किसी एक दूसरे चेहरे की एक झलक के लिये कोई ताकयामत इंतज़ार करने को तैयार है। इन्हीं चेहरों पर परी देश का सम्मोहक जादू तैरता है और इन्हीं पर किसी तांत्रिक का मरणसिद्ध तंत्र भी।

दुनिया की हर कहानी में कोई न कोई हसीन चेहरा है, कोई न कोई भयानक चेहरा है, कोई न कोई मुस्कराता हुआ चेहरा है और कोई न कोई रोता हुआ चेहरा है। सच है, चेहरों के बगैर कहानियाँ नहीं होतीं, चेहरों के बगैर सपने नहीं होते, चेहरों के बगैर ज़िंदगी नहीं होती और हाँ, ….. चेहरों के बिना शायरी भी नहीं होती। दुनिया का कोई भी साहित्य हो, वह चेहरों से भरपूर है। शेक्सपियर ने तो यहाँ तक कहा है कि ‘फ़ेस इज़ दि इंडेक्स ऑफ माइंड’ और इसी तरह उर्दू शायरी में शायर के तसव्वुर में जो चीज़ सबसे ज़्यादा ताजगी से भरी और सबसे चमकदार है वह है महबूब का चेहरा। आधुनिक शायरी में कहीं-कहीं यह चेहरा आम आदमी का चेहरा है, मासूमियत का चेहरा है, धूर्तता का चेहरा है, लालच का चेहरा है, मक्कारी का चेहरा है, क्रूरता का चेहरा है और बेबसी का चेहरा है।

उर्दू के हर छोटे-बड़े शायर ने अपने-अपने फ़न से इन चेहरों की पड़ताल की है और हर बार किसी चेहरे या सूरत के ज़रिये उन्होंने ख़यालों के बेमिसाल मंज़र सृजित किये हैं। कितना मज़ेदार और दिलचस्प होगा इन बेहतरीन शायरों की शायरी में तमाम चेहरों से बातें करना और उन्हें परखना। चलिये, इस बार हम-आप उर्दू शायरी के इस नये सफ़र में ढेर सारे चेहरों से मुलाकात करते है, ढेर सारी सूरतों को निहारते हैं और उन्हें दिल में बसाने की कोशिश करते हैं।

और हाँ, एक और बात को समझना बहुत ज़रूरी है कि जब ढेर सारे शायर हों तो उन्हें एक क्रम तो देना ही पड़ता है। किसी शायर की वरिष्ठता अथवा श्रेष्ठता तय करने की न तो मुझमें योग्यता ही है और न ही कभी मैंने इसका प्रयास ही किया है। मुझे तो सारे शायर दिल से पसंद हैं और मेरे लिये गुलाब और रातरानी, दोनों की खुश्बू दिल को सुकूं पहुँचाने वाली हैं। मैंने मात्र अपनी व पाठकों की सुविधा की दृष्टि से शायरों का क्रम उनकी जन्मतिथि के आधार पर रखने का प्रयास किया है। ये सूचनायें भी मैंने उपलब्ध पुस्तकों व सूचना के अन्य स्रोतों जैसे इंटरनेट पर उपलब्ध विवरण से प्राप्त की हैं इसलिये यदि सूचनाओं का कोई विवरण अथवा उसका कोई अंश गलत है तो मैं उसके लिये आपसे प्रारंभ में ही क्षमाप्रार्थी हूँ और आपसे निवेदन है कि यदि आपके पास प्रमाणिक सत्य सूचना है तो कृपया मुझसे अवश्य शेयर करें ताकि ऐसी त्रुटि का सुधार किया जा सके। कुछ पुराने शायरों व अनेक नये शायरों की जन्मतिथि उपलब्ध न होने के कारण उन्हें क्रम में समुचित स्थान मैंने स्वयं ही दिया है जिसका आधार मेरी अपनी सुविधा मात्र है। सत्यता यह है कि मेरी स्पष्ट धारणा हेै कि प्रत्येक शायर व फ़नकार स्वयं में अनूठा है और उस जैसा कोई दूसरा हो ही नहीं सकता।

बशीर बद्र उर्दू साहित्य के उन चंद शायरों में हैं जिन पर उर्दू शायरी खुद नाज़ कर सकती है। उनका जन्म 15 फरवरी, 1935 में हुआ। मिर्ज़ा ग़ालिब के बाद वही एक ऐसे शायर हैं जिनके सबसे ज़्यादा अशआर आम आदमी की ज़ुबान पर चढ़े। यह शेर उनकी एक बहुत मशहूर ग़ज़ल का है। खूबसूरती का एक चेहरा है और चेहरे की खूबसूरती की तो बात ही क्या। आइये, दिलों की धड़कनों का हुनर रखने वाले इस शायर के चेहरे पर  कुछ खूबसूरत अशआर से मुलाकात करते हैं –

“वो चेहरा किताबी रहा सामने,
बड़ी ख़ूबसूरत पढ़ाई हुई ।”

यह शेर भी –

“शबनम के आँसू फूल पर ये तो वही क़िस्सा हुआ।
आँखें मिरी भीगी हुई चेहरा तिरा उतरा हुआ॥”

हकीम मंज़ूर का वास्तविक नाम मोहम्मद मंज़ूर है। उनका जन्म 17 जनवरी, 1937 में श्रीनगर में हुआ एवं उनकी मृत्यु 21 दिसंबर, 2006 को हुई। ‘ख़ुश्बू का नाम नया’, ‘बर्फ रुतुओं की आग’ और ‘लहू लम्स चिनार’ उनकी मशहूर पुस्तकें हैं। चेहरा हमारे व्यक्तित्व का आईना है। पहचान के लिये चेहरा बहुत ज़रूरी है। चेहरे पर उनका यह खूबसूरत शेर देखिये –

“हम किसी बहरूपिए को जान लें मुश्किल नहीं,
उस को क्या पहचानिये जिस का कोई चेहरा न हो।”

निदा फ़ाज़ली उर्दू शायरी के अत्यंत लोकप्रिय शायर हैं। उनका जन्म 12 अक्टूबर, 1938 को दिल्ली में हुआ और उनका इंतक़ाल 8 फरवरी, 2016 को मुंबई में हुआ। ‘चेहरे’ और ‘खोया हुआ सा कुछ’ उनके मशहूर पुस्तकें हैं। उर्दू की जदीद शायरी में दोहों का शानदार प्रयोग भी उनके हिस्से में जाता है। वे साहित्य अकादमी ऐवार्ड व पद्मश्री जैसे सम्मानों से सम्मानित थे। दुनिया में कुछ भी मुकम्मल नहीं है। प्यार करने वाला इस दुनिया के किसी न किसी चेहरे से बंधा है। वह चेहरा न दूरी से प्रभावित और न ही समय से। वह हर जगह हर हाल में दिखता है जैसे कहीं दिल में ही कहीं अटका हुआ हो। चेहरे पर क्या खूबसूरत शेर कहा है –

“वो एक ही चेहरा तो नहीं सारे जहाँ में,
जो दूर है वो दिल से उतर क्यूँ नहीं जाता।”

बशीर फ़ारुक़ी का वास्तविक नाम बशीरुद्दीन अहमद फ़ारुक़ी था। उनका जन्म 20 मई, 1939 को लखनऊ में हुआ और उनकी मृत्यु भी लखनऊ में ही 01 जून, 2019 को हुई। वे शायरी की दुनिया में लखनवी स्कूल का पुरज़ोर तरीके से नुमाइंदगी करते थे और उनका शुमार उर्दू के बेहतरीन शायरों में किया जाता है। ‘दायरों के दरम्यिान’ और ‘परों के दरम्यिान’ उनके दीवान हैं। चेहरे पर उनकी बक़ायदा पूरी एक बेहद खूबसूरत ग़ज़ल है जो चेहरे के तमाम रंग हमारे सामने परोसती है। आइये, इस बेहतरीन सदाबहार ग़ज़ल के कुछ अशआर का लुत्फ़ उठाते हैं –

“कोई रखता नहीं इस शहर में अपना चेहरा।
है अगर जिस्म किसी का तो किसी का चेहरा॥

ज़िंदगी मैंने तिरी एक झलक देखी थी,
आज तक ढूंढ रहा हूँ तुझे चेहरा चेहरा।

मेरे चेहरे पे ठहर जाये ज़माने की नज़र,
बख़्श दो तुम मुझे कुछ देर को अपना चेहरा।”

अतहर नबी उर्दू दुनिया का जाना पहचाना नाम है। उनका जन्म 14 अगस्त, 1941 को लखनऊ में हुआ। उर्दू शायरी से वाबस्ता सैकड़ों राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रमो के सफल संयोजन का श्रेय उन्हें हासिल है और उर्दू की पहचान को न केवल ज़िंदा रखने के लिये बल्कि चमकदार बनाने के लिये वे अपनी ज़िम्मेदारी बखूबी निभा रहे हैं। वे एक मंजे हुये शायर भी हैं और उनकी शायरी में आम आदमी की संवेदना बेहतर ढंग से झलकती है। ‘मिज़गाँ मिज़गाँ’ उनका दीवान है। चेहरे पर उनकी एक मुकम्मल ग़ज़ल है जिसके चंद शेर आपके लिये प्रस्तुत हैं –

“सियाह रात में वो एक अजनबी चेहरा।
बिखेरता रहा तादेर चाँदनी चेहरा॥

हमारे दौर में सब चेहरे एक जैसे हैं,
किसी के चेहरे पे रख दीजिये कोई चेहरा।

ये कायनात मुजस्सम करो तो लगता है,
धनक बदन है, घटा ज़ुल्फ़, रोशनी चेहरा।

अजब फ़कीर है, बोसीदा हाल है लेकिन,
अंधेरी रात में देता है रोशनी चेहरा।

ये वो नहीं है, कोई और है मगर ‘अतहर’,
वही अदा, वही रफ़्तार और वही चेहरा।”

‘तादेर’ यानी ‘देर तक’, ‘मुजस्सम’ यानी ‘मानवीकरण’, ‘धनक’ अर्थात् ‘इंद्रधनुष’ और ‘बोसीदा’ मतलब ‘जर्जर व पुराना’।

क्रमशः

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