जीवन में झलके विकास

पिछले तीन दशकों से भारत दुनिया में सबसे ज्यादा गरीबों का घर बना हुआ था। लेकिन अनेक अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने माना है कि 2022 तक यहां 5 फीसदी ही अत्यंत निर्धन लोग बचेंगे। यहां अत्यधिक निर्धनता का पैमाना है एक व्यक्ति की रोजाना की औसत कमाई 1.9 डॉलर (135 रुपये) या उससे कम।

यह लक्ष्य हासिल कर लिया गया तो अत्यंत विरल अपवादों को छोड़कर भूख से कोई नहीं मरेगा। दरअसल 1990 के बाद से निर्धनता कम होने की प्रक्रिया में तेजी आई और 2004-05 में इसने रफ्तार पकड़ी। गरीबी रेखा से नीचे के लोगों को मुफ्त राशन उपलब्ध कराने की योजनाएं पिछले वर्षों में शुरू हुईं, जिनका नतीजा अब देखने में आ रहा है। हालांकि हमारे यहां विकास प्रक्रिया बहुत असंतुलित रही है। इसमें काफी लोगों को भुखमरी से उबारा गया लेकिन इसका ज्यादा लाभ उस तबके ने उठाया जो पहले से ही लाभान्वित था। यानी अमीर और अमीर होता गया। गरीब भी आगे बढ़ा लेकिन अमीरों की रफ्तार ज्यादा तेज रही। नतीजा यह हुआ कि समाज में असमानता बढ़ती गई। 2018 के एक सर्वे के अनुसार भारत के 1 फीसदी सबसे अमीर लोगों के पास देश की 73 फीसदी संपत्ति है। जाहिर है, गरीबी उन्मूलन का अगला चरण यह होना चाहिए कि लोग जीवन निर्वाह की स्थिति से ऊपर उठें। यानी उन्हें पौष्टिक भोजन, कामकाजी शिक्षा और स्वास्थ्य उपलब्ध कराया जाए। विकास प्रक्रिया की कसौटी भी यही होगी। इस प्रक्रिया का ही नतीजा है कि भारतीयों की जीवन प्रत्याशा (लाइफ एक्सपेक्टेन्सी) लगातार बढ़ रही है। 1951 में यह 32 वर्ष थी, जो 2013 में 69 वर्ष हो गई। इसका कारण यह है कि कई बीमारियों को पूरी तरह खत्म कर दिया गया है। इन पर दुनिया भर में हुए शोध का फायदा भारत को भी हुआ है। सभी जरूरी दवाएं और आधुनिक चिकित्सा देश में उपलब्ध है। स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार जारी है। लेकिन इस क्षेत्र में लक्ष्य यह होना चाहिए कि अच्छी स्वास्थ्य सुविधा समाज के हर नागरिक को मयस्सर हो। इसी तरह युवाओं की साक्षरता दर 1951 में 18 प्रतिशत थी, जो 2015 में 86 प्रतिशत हो गई। हालांकि साक्षरता का कोई मायने तभी है जब इससे लोगों की सामाजिक-आर्थिक हैसियत बदले। जाहिर है, हमें अपने लक्ष्य भी बदलने होंगे।

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