तरुण प्रकाश, सीनियर एग्जीक्यूटिव एडीटर-ICN ग्रुप
जैसे सारे कोमल कोमल बच्चे
बन गये हैं
उस बड़ी मशीन के
छोटे छोटे पुर्जे
जिसमें पहले से ही भरा है
दुनिया का समूचा प्रबंध तंत्र!
ओह! यह कैसा छल है,
यह कैसा षड्यंत्र!!
इस मशीन में भरा जाता है
बचपन और किशोरावस्था के स्वप्नों का
ताजा लहू,
मुलामियत से भरी लचीली देह के,
सूख कर लकड़ी बन जाने तक का
पूर्व नियोजित श्रम
और नित्य की
अरुचिकर जूझन एवं उनसे उपजी
हताशा और निराशा
और बदले में
मशीन उगलती है
मात्र असीमित प्रोद्योगिकी और प्रबंधन
शायद हम बढ़ चले हैं-
मनुष्य से मशीन होने की दिशा में।
समझते हैं लोग –
आ चुका है परम विकास का युग
मानव से महामानव होने का समय।
मैं हतप्रभ हूँ, थोड़ा थोड़ा निराश
किंतु उससे ज़्यादा अचंभित …
सूंघना चाहता हूँ इन तकनीकी फूलों में खुशबू,
महसूस करना चाहता हूँ –
इस डिजिटल आग में हरारत,
स्पर्श करना चाहता हूँ
अपने चारों ओर रुक-रुक कर होती हुई
हरसिंगार की बारिश
लेकिन सारे चित्र जमे हुये हैं बर्फ़ में कहीं गहरे
जिनमें सुंदरता तो है लेकिन जीवन नहीं।
अब बच्चे नहीं सीखते
बांसुरी में मनमोहक राग भरना,
अब केवल चित्र कला के सहारे
कोई नहीं चाहता जीवन की सीढ़ियाँ चढ़ना,
कोई नहीं पसंद करता इतिहास और भूगोल पढ़ना,
सांचों से पुर्जे बनाने के कारखाने में व्यस्त है प्रतिभा-
अब कोई नहीं चाहता अपनी लचीली उंगलियों से
मिट्टी के नये नये खिलौने गढ़ना।
मैं बार-बार चीखता हूँ –
साइकिलों पर बडे़ बडे़ बस्ते लादे
स्कूल जाते उड़े हुये रंग के बच्चों को देखकर,
वे मुझे नहीं देखते- न मुझे सुनते हैं,
बस दूर तक दिखती है
उनकी उघारी कोमल पीठ
जिस पर चस्पा है –
उनके माता-पिताओं के अधूरे सपनों की फेहरिश्त
जो खांसी के बलगम की तरह थूक दी गई है उनपर।
समाप्त हो रहे हैं चांदी की घंटियों के स्वर
बांसुरी से झरता अमृत
तानसेन अपनी समाधि में विचलित है,
पिकासो ढंग से मरना चाहता है-
हाथों और कपड़ों पर गीले रंगों के चिह्न महसूस करते हुये,
प्रेमपत्र पर सहेज कर धरी खुशबू के गवाह व्याकुल हैं।
देह पथरीली होने लगी है
सोच इस्पात बन कर रह गयी है
कोई कंपन नहीं, न कोई सिहरन
सब कुछ थोड़ा रबड़ जैसा, थोड़ा प्लास्टिक सा।
मैं लौट कर नहीं जाऊंगा घर,
अभी सैकड़ों बच्चे गुजरेंगे
हजारों बच्चे
हाट के एक जैसे खिलौने बनने की दौड़ में शामिल
मैं रोकूंगा उन्हें
मैं बताऊंगा कि मनुष्यता का मशीनीकरण आत्मघाती है
मशीन मनुष्य के लिये है – मनुष्य मशीन के लिये नहीं
आंकड़े जीवन नहीं होते
तकनीक मनुष्यता नहीं होती।
मुझे विश्वास है – कोई न कोई अवश्य सुनेगा
उतार फेंकेगा-
दूसरों के विषैले सपनों की नागफनी अपनी नंगी पीठ से
और ओढ़ लेगा अपना खुद का
कोमल बचपन।
ऐसा होगा,
हाँ, ऐसा अवश्य होगा,
क्योंकि
गंगा में अभी भी ताज़ा पानी है
आसमान पर अभी तक पंछी तैर रहे हैं
अभी भी यदा-कदा गुलाब महकते हैं
और हाँ,
अभी भी कुछ लोगों के सीने में टिक-टिक करती घड़ी नहीं,
एक असली दिल मौजूद है।

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