प्रधानमंत्री शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग ने बांग्लादेश में रविवार को हुए आम चुनाव में लगातार तीसरी बार शानदार जीत दर्ज की है।
सत्तारूढ़ अवामी लीग के नेतृत्व वाले महागठबंधन ने 266 सीटें जीतीं जबकि उसकी सहयोगी जातीय पार्टी को 21 सीटें हासिल हुईं। विपक्षी नेशनल यूनिटी फ्रंट (यूएनएफ) को सिर्फ सात सीटों पर जीत मिली। यूएनएफ में केंद्रीय भूमिका पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की थी।गौरतलब है कि बांग्लादेश की ‘जातीय संसद’ की सदस्य संख्या 350 है, जिनमें 300 सीटों के लिए मतदान होता है, बाकी 50 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। इन 50 सीटों के लिए निर्वाचित 300 प्रतिनिधि एकल समानुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर वोट डालते हैं। विपक्ष का आरोप है कि चुनाव में जबर्दस्त धांधली हुई है। निर्वाचन आयोग ने कहा है कि वह इसकी जांच करेगा। बांग्लादेश की राजनीति एक लंबे अर्से से शेख हसीना और खालिदा जिया के इर्द-गिर्द ही घूम रही है। बीएनपी की अध्यक्ष बेगम खालिदा जिया भ्रष्टाचार के मामलों में दोषी ठहराए जाने के बाद जेल में सजा काट रही हैं। उनके बेटे तारिक रहमान को शेख हसीना को जान से मारने के षड्यंत्र में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है और वे लंदन में आत्म निर्वासन में रह रहे हैं। बेगम जिया के कारावास के बाद उनकी पार्टी की बागडोर तारिक रहमान संभाल रहे है। पिछले कुछ वर्षों में अवामी लीग के नेतृत्व में बांग्लादेश ने आर्थिक रूप से अपनी स्थिति में उल्लेखनीय सुधार किया है। अभी उसकी हालत पाकिस्तान से बेहतर है। यह चुनाव भी शेख हसीना ने विकास के मुद्दे पर ही लड़ा।
उन्होंने ‘डिवेलपमेंट एंड डेमोक्रेसी फर्स्ट’ के साथ स्थायी विकास का नारा दिया था। हालांकि उन पर राजनीतिक हिसाब चुकता करने के आरोप भी लगते रहे हैं। इस चुनाव की मुश्किल यह है कि इसमें विपक्ष का लगभग सफाया हो गया है, जो बांग्लादेश के लिए काफी मुश्किलें पैदा कर सकता है। पिछले कुछ समय से वहां इस्लामिक कट्टरपंथियों का तेज उभार देखा गया है। उन्होंने आधुनिकता की वकालत और इस्लामी कट्टरपंथ की आलोचना करने वाले कई प्रोग्रेसिव ब्लॉगरों की हत्या की, जिनमें मुस्लिम और हिंदू दोनों शामिल थे। दुर्भाग्यवश, हसीना सरकार ने ऐसे तत्वों के खिलाफ कठोर कदम नहीं उठाए। 1971 के मुक्तियुद्ध के गद्दारों को उन्होंने फांसी जरूर दिलवाई पर इस्लामी कट्टरपंथियों पर हाथ डालने से बचती रहीं। संसदीय प्रतिनिधित्व के अभाव में यह कट्टरवादी तबका आगे और उत्पात मचा सकता है। ऐन पड़ोस में ऐसे तत्वों का सक्रिय होना हमारे लिए चिंता का विषय रहेगा। शेख हसीना से भारत के रिश्ते बहुत अच्छे हैं, फिर भी बांग्लादेश गए भारतीय नेता वहां के विपक्षी लीडरों से भी मिलते रहे हैं। वहां की आंतरिक राजनीति को लेकर तटस्थता ही हमारी स्थायी नीति होनी चाहिए। हमारी भलाई इसी में है कि यह पड़ोसी मुल्क अमन-चैन के साथ विकास की राह पर आगे बढ़े।

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