न तुम बदले, न हम बदले, न वक्त बदला, न समाँ बदला और न बदले ज़ज्बात: सत्येन्द्र

सत्येन्द्र कुमार सिंह ( सहायक संपादक-ICN हिंदी ) 
1
कभी सुनी है तुमने तन्हाई की आवाज़
बैठे थे जो साथ, हम तुम कभी
हाथों में हांथ भी था, और महसूस किया था
हृदय-भावों का निर्मल चुम्बन।
किंचित आँखों से ही  कुछ तुम कह रहे थे
कुछ हम सुन रहे थे
आँखों में छितराए मोती किसी दर्द के प्रतिरूप थे।
शायद कुछ पल संग रहने की खुशी थी, या
अनजाने कल का था कुछ डरा-डरा सा डर।
पर साँसों के उतार-चढ़ाव से कभी उठते-कभी झुकते हुए
सिर से भावों का स्वर सुनाई दे रहा था।
कभी झुकी, कभी चोर नज़रों
से भी तो तुम कुछ कह रहे थे।
हम साथ थे फिर भी एक तन्हाई साथ थी,
या यूँ कहें कि तन्हाइयों के बीच भी तो हम साथ थे।
तभी तन मे उठते सिहरन से लौट आया मैं भावों के
कोप-भवन से, और पाया मैनें तुम्हें भी
सिहरन छुपाते हुए।
बहुत कहा तुमने , बहुत कहा मैने
न बोले होंठ तो क्या बहुत सुना तुमने, बहुत सुना मैने
अपनी तन्हाई की भाव-भरी बातें।
2
न तुम बदले, न हम बदले,
न वक्त बदला, न समाँ बदला
और न बदले ज़ज्बात।
न निगाहें बदली, न सीरत बदली,
न अरमान बदलें, न ख्वाइशें बदलीं
तो क्या बदल गए हालातघ्
न बदला सुबह-सुबह खुदा
से दुआ का वो माँगना
कि खुश रहो तुम और
न बदलो मुस्कुराना तुम
फिर भी लोग कहते हैं
मैं स्वार्थी हूँ
हाँ! हूँ कि तुम खुश रहोगे,
तो मैं भी मुस्कुरा दूगाँ।
हाँ, याद आया- न तुम बदले, न हम बदले
न वक्त बदला, न समाँ बदला
और न बदले ज़ज्बात
हाँ बदला है तो केवल मेरा अंदाज-ए-बयान।

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